4 logassas mein kitne swasssas hote hai
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जैन आगमों और परंपरागत मान्यताओं के अनुसार, "लोगस्स" (Logassa) एक महत्वपूर्ण स्तोत्र है, जिसे उपासरगहर स्त्रोत भी कहा जाता है। यह ४ (चार) बार पढ़ने का विशेष महत्व बताया गया है।
जैन साधना में "स्वास" (श्वास/सांस) की गिनती साधना या जाप के समय की जाती है। पारंपरिक मान्यता के अनुसार, एक व्यक्ति सामान्य रूप से एक लोगस्स स्तोत्र पढ़ते समय लगभग १०८ स्वास (सांस) लेता है। अतः यदि कोई व्यक्ति ४ लोगस्स का पाठ करता है, तो उसमें कुल स्वासों की संख्या होती है:
१०८ स्वास × ४ लोगस्स = ४३२ स्वास
निष्कर्ष: चार लोगस्स पढ़ने में लगभग ४३२ स्वास (सांसें) लगती हैं।
यह संख्या व्यक्ति की पाठ करने की गति और उसके श्वसन की गति पर भी निर्भर करती है, इसलिए यह एक अनुमानित औसत है।