संसारी जीव अनादी काळसे कोणसी दशा मे मग्न है
संस्कारी जीव अनादिकाल से संसार-माया में मग्न रहते हैं क्योंकि वे कर्म के बंधन से मुक्त नहीं हो पाते। आणविक कण-फन के रूप में लगे ये कर्म उनके भाव-क्रियाओं से जुड़ते रहते हैं और वे पुनः पुनः जन्म-जन्मांतर घूमते रहते हैं—देह-यात्रा (गति) अलग-अलग लोकों में होती है (नरक, मनुष्यों का गोत्र, देव, आदि)। यह सब अज्ञान ( avidya ) और काम, क्रोध, लोभ आदि मानवीय आसक्तियों के कारण होता है, जो bondage (बंध) बनाते हैं और मोक्ष की दिशा से उन्हें दूर रखते हैं।
बुनियादी बात:
- संसार में रहने वाला जीव अनादिकाल से बन्धन में है: जन्म- मृत्यु- पुनर्जन्म के चक्र से मुक्त नहीं हो पाता।
- यह बन्धन कर्मों के कारण है, जो जीवन के आचरण, विचार और इरादों से जमा होते हैं।
- मोक्ष तब संभव है जब सही ज्ञान, सही मान्यता और सही आचरण (सम्यक ज्ञान/सम्यक दर्शन/सम्यकाचार) के मार्ग पर चलकर कर्मों को समाप्त या नोच दिया जाए।
अगर आप चाहें, मैं इस विषय मेंDigambar और Shwetambar परंपराओं के अनुसार अलग-अलग व्याख्या भी सरल शब्दों में स्पष्ट कर दूँ।