सम्यग्दृष्टि के मूलगुण कितने होते है जैन धर्म के अनुसार
सम्यग्दृष्टि (सम्यग्दृष्टि) के मूल गुण (मूल-लक्षण) आम Jain मान्यताओं के अनुसार पाँच माने जाते हैं:
- सम (समभाव) – आत्मा और तत्वों के प्रति शुद्ध-विपरीत भावना का अभाव।
- संवेग (संवेग) – आत्मा के सुख-दुख की सत्य भावना, सत्याभीक्षा का अनुभव।
- निर्वेद – अनासक्ति या विराग्यता; वैराग्य की स्थिरता।
- अनुकम्पा – दूसरे जीवों के दुख को अपना समझना और करुणा दिखाना।
- आस्तिक्य – पुण्य-पाप, पुनर्जन्म, कर्म-सिद्धान्त आदि को स्वीकारना और मुक्ति के मार्ग में विश्वास रखना।
इन पाँचों को मिलाकर सम्यग्दृष्टि के पाँच लक्षण कहे जाते हैं। कुछ विद्यालयों में क्रम या वर्णन में हल्का-फुल्का भिन्न हो सकता है, लेकिन इसके मूल उद्देश्य समान रहते हैं: सही आचरण, सही विश्वास और सही मार्ग का साधन।
यदि आप चाहें, मैं इन पाँचों लक्षणों को छोटे-छोटे उदाहरणों के साथ और अधिक सरल शब्दों में भी समझा सकता हूँ।