I never said spritual faul, I said without body it cannot reach point B and reside there
आपके कथन से जो बात समझ में आ रही है, उसे जैन धर्म के अनुसार स्पष्ट कर दूँ।
- जैन दृष्टि में जीव (आत्मा) कभी-भी “बिना शरीर” काम नहीं करता है, क्योंकि शरीर ही कर्मों को ग्रहण करने और अनुभव करने का माध्यम है। लेकिन यह بات भी है कि जब सभी कर्मों से मुक्त हो कर आत्मा मोक्ष पा लेती है, तब वह Siddhalok में स्थित होती है—यहाँ किसी देह (शरीर) की आवश्यकता नहीं रहती।
- मोक्ष के बाद आत्मा किसी स्थान पर “रहती” है, जैसा कि संसार के भीतर शरीरधारी जीवन में होता है, नहीं। मोक्ष पाने के बाद आत्मा निर्गुण रूप से एक अत्यंत विशुद्ध अवस्था में रहती है और उसे देह-आश्रय नहीं चाहिए होता। इसे कुछ संदर्भों में नश्वर देह-चक्र से मुक्त स्थिति कहा गया है।
- इसलिए अगर आपका मतलब “बिना शरीर के किसी स्थान तक पहुँचना और वहाँ रहना” है, तो जैन धर्म में दो स्थिति स्पष्ट हैं:
यदि आप किसी विशिष्ट स्त्रोत, sutra या श्वेताम्बर/दिगंबर-दृष्टि के अनुसार इस विचार को समझना चाहें, तो बताएँ—मैं उसी के अनुरूप सही arth (अर्थ) और स्थान-संकेत स्पष्ट कर दूँगा।