there is no meru parvat at center of earth between bharat kshetra and mahavideh kshetra
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संक्षेप में तथ्य यह है कि जैन cosmology में मेरु पार्वत पृथ्वी के भीतर के केन्द्रस्थ पर्वत के रूप में वर्णित है, और इसके चारों ओर सप्त महाद्वीप/विप (ड्वीप) बनते हैं—इनमें भारत क्षेत्र (जाम्बुदीप) और महावीदेश/महावेदह भी आते हैं। पर यह पुराणिक-धर्मग्रंथों में स्थान-रचना के विभिन्न पाठों के कारण कुछ जगहों पर भिन्न-भिन्न व्याख्या मिलती है, और Digambar‑Shwetambar दोनों परंपराओं में कुछ विवरण अलग हो सकते हैं।
मुख्य बिंदु:
- मेरु पार्वत को संसार का केंद्रीय axis कहा गया है, जिसे वृहत् पृथ्वी के केंद्र के चारों ओर महाद्वीप घूमते दिखाए जाते हैं।
- भारत क्षेत्र (जाम्बुदीप) और महावेदह/महावीदेश सहित अन्य द्वीप-समूह मेरु के चारों ओर स्थित बताए जाते हैं; कई कथनों में यह व्यवस्था पृथ्वी-आकृति के अनुसार क्रमबद्ध बतायी गयी है।
- कुछ ग्रंथों में स्थान-स्थिति अलग दिखाई देती है या प्रतीकात्मक अर्थ में लिया जाता है; Digambar तथा Shwetambar ग्रंथों में समान मार्ग से जुड़े कई उदाहरण मिलते हैं, पर विवरण में भिन्नता भी मिलती है।
यदि आप किसी खास ग्रंथ (जैसे digambara/śvetāmbara-परंपरा के पाठ) के अनुसार मत-भेद देखना चाहते हैं, बताएं—मैं उसी पर स्पष्ट, संक्षिप्त व्याख्या दे दूँगा।