क्या पुरानी आचार्य की भक्तियों या ग्रन्थो में - "मेरा शारिरीक रोग ठीक हो" यह भावना सीधी रूप से आयी है? .. any references
संक्षेप में Jain Dharma की दृष्टि से यह سؤال है कि पुराने आचार्यों की भक्तियों या ग्रंथों में “मेरा शारीरिक रोग ठीक हो” जैसी भावना सीधे पूछी जाती थी या नहीं।
- ज्यादातर प्राचीन Jain भक्तिग्रंथों और स्तोत्रों का केंद्रीय लक्ष्य मोक्ष, शुद्धि और अहिंसा-आचार को स्थिर करना है। शारीरिक रोग-चिकित्सा सीधे इन ग्रंथों के प्रमुख उद्देश्य नहीं माने जाते।
- कुछ कथानक ग्रंथों में अचरणीय (आचार्य) महापुरुषों के चमत्कार या रोग-निवारण जैसी घटनाओं का संकेत मिल सकता है, लेकिन वही कथन devotional-प्रार्थना के मुख्य स्वर नहीं होते; उनका स्थान अक्सर कुल-परंपरा-उज्ज्वल आचरण और आत्म-शुद्धि की खातिर होता है।
- भक्तिमाला/स्तोत्रों में सामान्य रूप से रोग-चिकित्सा के लिए नहीं, बल्कि ईश्वर-विश्वास, नैतिक-आचरण, मैत्री-करुणा, तपस्या आदि की तरफ प्रेरणा दी जाती है। उदाहरण के रूप में नमोकार मंत्र और भक्तामर-स्त्रोत जैसी साधना-संस्कारों में आत्म-उन्नति और निष्काम भक्ति पर जोर है, रोग-निवारण कोई प्राथमिक अभिलाषा के रूप में कम से कम शास्त्रीय संचय में नहीं माना जाता।
क्या यह भावना Digambar/Shvetambar परंपराओं में भिन्न मिलती है?
- दोनों प्रमुख परंपराओं में भक्तिगीतियां और स्तोत्र मुख्यतः मोक्ष-उल्लेख, श्रद्धा-विश्वास और जिन-गुणों का स्मरण कराती हैं; रोग-चिकित्सा के लिए विशिष्ट प्रार्थना की प्रवृत्ति लिपिबद्ध नहीं है। कुछ ग्रंथों में चमत्कार-वर्णन मिल सकता है, पर यह सामान्य प्रार्थना-धारा का हिस्सा नहीं है।
अगर आप चाहें, मैं आपके प्रश्न के साथ specific ग्रंथ-स्त्रोत की पंक्तियाँ (Digambar बनाम Shwetambar के अंतर के साथ) दे सकता/सकती हूँ। साथ ही JainKnowledge.com पर ऐसे विषयों से जुड़ी प्रस्तुति/पन्नाएँ मिलें तो उनके लिंक भी दे दूँगा/दूँगी—बस बताइए कि आप किस प्रकार के ग्रंथों (Bhaktamar, Namokar, Ratnakaranda etc.) की चर्चा खोज रहे हैं।