पापों का संपूर्ण त्याग क्या कहलाता है
पापों का संपूर्ण त्याग का मतलब है—अपने जीव को सभी पापों के कर्मबंधनों से पूरी तरह मुक्त कर देना। यह निराकार मोक्ष का मार्ग है, जहाँ जीव के ऊपर से सारे पाप-कारण हट जाते हैं और आत्मा शुद्ध अवस्था में पहुँचती है।
मुख्य विचार:
- पाप karmic बंधन होते हैं; इन्हें शुद्ध आचरण, ज्ञान और प्रतीक (व्रत/अनुष्ठान) के जरिए हटाया जाता है।
- यह स्थिति तब संभव होती है जब व्यक्ति सही दृष्टि-ज्ञान-आचरण (सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान, सम्यक चरित्र) को अपनाता है और महाव्रतों के पालन से आत्मा को भीतर से मुक्त कर देता है।
- महाव्रत: अहिंसा, सत्य, अचर्य/अस्वरूप (अपरिग्रह), अचौर्य, ब्रह्मचर्य आदि का पूर्ण पालन इनमें प्रमुख हैं; Digambar-Śvetambar दोनों पर समान लक्ष्य है, पर क्रम और रूपांतरण में कुछ वैरिएशन हो सकता है।
संक्षेप में: पापों से पूर्ण त्याग को Jainism में मोक्ष का मार्ग कहा जाता है—ऐसा अवस्था प्राप्त करने के लिए संपूर्ण सही तप, आचरण और ज्ञान का संयोजन आवश्यक है।
अगर आप चाहें, मैं इसे सरल उदाहरणों के साथ और अधिक स्पष्ट कर दूँ।