कालचक्र के बारे में समझाइए
संक्षेप में: Jain धर्म में "Kalachakra" जैसा विशेष सिद्धांत (जिन्हें अक्सर बौद्ध, हिन्दू धारणाओं में wheel of time कहा जाता है) मुख्य रूप से नहीं मानी जाती। जैन धर्म में समय को चक्र के रूप में माना गया है, पर उसका वर्णन हल्के-फुल्के तरीके से किया गया है, न कि एक अलग-सी चाल-खाल के रूप में।
जैन समय (Kalachakra से सम्बद्ध विचारों के बजाय) कैसे समझिए:
- समय दो भागों में रहता है: utsarpiṇi (उत्सरפּिणि) और avsarpiṇi (असर्वरपिणि)।
- utsarpiṇi वह समय चक्र है जब सत्संगति, धर्म और आयु उत्तरोत्तर बढ़ती हैं—मानव जीवन uzun और धार्मिक चरित्र ऊँचे रहते हैं।
- avsarpiṇi वह समय है जब धर्म घटता है, आयु घटती है और मनुष्यों के आचरण में अवनति होती है; फिर धीरे-धीरे पुनः utsarpiṇi आता है।
- इन दोनों भागों के भीतर कई चरण और बदलाव आते हैं, परन्तु इसे धार्मिक-आचार, मोक्ष-मार्ग और जीवों के कर्म-फल से जोड़ा गया है, न कि किसी आधुनिक “Wheel of Time” मार्गदर्शक के रूप में।
यदि आप चाहें, मैं इस विषय को दिगंबर-श्वेताम्बर परंपराओं के संदर्भ में भिन्न-भिन्न व्याख्याओं के साथ और सरल शब्दों में समझा सकता/सकती हूँ।