उवसग्गहरं पासं, पासं वंदामि कम्मघण-मुक्कं। विसहर-विसभीमंतं, कमठ-संपज्जवेणिविवत्तं
यह श्लोक “उवसग्गहरं पासं, पासं वंदामि कम्मघण-मुक्कं। विसहर-विसभीमंतं, कमठ-संपज्जवेणिविवत्तं” एक Jain प्रार्थना-श्लोक है जो उवसग्गहर (उवसग्गहरण) को समर्पित है। इसे सामान्यतः obstacle-remover, karm bondage-तोड़ने वाले भाव के रूप में लिया जाता है।
Arth (अर्थ) – सरल स्पष्टता
- उवसग्गहरं पासं: मैं Uvasaggahara (संभवत: अवरोध और क्लेश हरने वाले देव/तत्त्व) को प्रणाम करता/करती हूँ।
- पासं वंदामि कम्मघण-मुक्कं: मैं उन karm-baddhataen (कर्म-बंधनों) को दूर करने वाले को प्रणाम करता/करती हूँ; जो कर्मों के बाँध से मोक्ष की ओर ले जाते हैं।
- विसहर-विसभीमंतं: जो भय और भीषण संकटों को दूर करता है; भय-निवारक गुण का सम्मान।
- कमठ-संपज्जवेणिविवत्तं: मन-चेतना में स्थित एक शांत और संयमी आचरण के साथ रहने वाले, सुकृत-कार्य में स्थिर रहने वाले भाव।
Shvetambar बनाम Digambar पर खास बातें
- व्याख्या में मूल तत्व वही रहता है: उवसग्गहर का कर्तव्य— obstacle removal, karma-mukti, भय-निवारण।
- किन्तु परंपरागत पाठ-व्याख्याओं में शब्दों के भाव-सम्बन्ध और पूजन-आचारे का स्वर Digambar और Śvetāmbara पर थोड़ा भिन्न-भिन्न जगहों पर उद्धृत हो सकता है। दोनों में मूल सत्संग-उद्देश्य और परमात्म-उपकार की धारणा समान रहती है।
यदि आप चाहें, मैं इस श्लोक की अधिक सटीक, स्रोत-आधारित व्याख्या दे सकता/सकती हूँ और Jain scriptures के अनुरूप गहराई से उसका अर्थ स्पष्ट कर दूँ।