Shrimandar swami se pradhansit shashwat tirth
जैन धर्म के अनुसार, श्रीमंदर स्वामी (श्री मंदार स्वामी) से प्रेरित और प्रधानित शाश्वत तीर्थ का विशेष महत्व है। शाश्वत तीर्थ वे तीर्थ हैं, जो चिरकाल से अस्तित्व में हैं और जिनका कभी विनाश नहीं होता। ये तीर्थ अनादि-अनंत माने जाते हैं। जैन मत के अनुसार, कुल चौबीस तीर्थंकर होते हैं, और हर तीर्थंकर के समय में कुछ शाश्वत तीर्थ होते हैं।
श्रीमंदर स्वामी एक पूर्वकालीन तीर्थंकर के रूप में जाने जाते हैं, जिनके काल में भी कुछ शाश्वत तीर्थों का उल्लेख मिलता है। शाश्वत तीर्थों में मुख्य रूप से निम्नलिखित तीर्थ स्थान सम्मिलित माने जाते हैं:
- शत्रुंजय (पलिताणा, गुजरात)
- गिरनार
- अष्टापद
- समेत शिखर (पारसनाथ पर्वत, झारखण्ड)
- चन्द्रगिरी
- राजगृह
- मंदरगिरि (श्रीमंदरगिरि)
- कुम्भज
- विदिशा
इन तीर्थों की विशेषता यह है कि प्रत्येक तीर्थंकर के काल में इन तीर्थों का महत्व बना रहता है। ऐसा कहा जाता है कि श्रीमंदर स्वामी के समय में भी यही तीर्थ शाश्वत रूप से प्रतिष्ठित थे।
शाश्वत तीर्थों की विशेषताएँ:
- ये तीर्थ कभी नष्ट नहीं होते।
- हर कल्प, हर तीर्थंकर के काल में, ये तीर्थ किसी-न-किसी रूप में विद्यमान रहते हैं।
- इन तीर्थों का उल्लेख शास्त्रों में मिलता है, जैसे कि 'तीर्थमाला' आदि ग्रंथों में।
संक्षिप्त में: श्रीमंदर स्वामी से प्रधानित शाश्वत तीर्थ उन स्थलों को कहते हैं, जो अनादी-अनंत हैं और हर तीर्थंकर के काल में पवित्र माने जाते हैं। इन तीर्थों की उपासना, जैन धर्म के अनुसार, मोक्षमार्ग में अत्यंत पुण्यदायक मानी जाती है।