There was mistake in mentioning Tantra. As per my knowledge, Yantra is Pratima (Murti), Mantra is Uvasaggaharam Stotra and TANTRA is how to chant Uvasaggaharam Stotra. Can you explain in this context?
धन्यवाद. नीचे संक्षेप में सही Jain दृष्टिकोण से स्पष्ट किया गया है।
- Yantra (यंत्र): Jain धर्म में यंत्र-चिन्तन प्रचलित परम्परा नहीं है जैसा कि कुछ अन्य धर्मों में मिलती है. जहाँ कुछ स्थानों पर भक्तिभाव या ध्यान के लिए चित्र-आकृति/भक्त-प्रतीक प्रयुक्त होते हैं, उसे सामान्य तौर पर Yantra नहीं कहा जाता; यह Jain-धर्म की प्रमुख भागीदारी नहीं है. Uvasaggaharam Stotra के संदर्भ में Yantra का विशेष महत्त्व नहीं है।
- Mantra (मंत्र): Jain व्यवहार में मंत्र एक पवित्र उद्घोषणा/जप-स्वर होता है, जो श्रद्धा, सम्यक्-ध्यान और पुण्य-आचरण के साथ किया जाता है. Uvasaggaharam Stotra एक स्तोत्र/चरण-गान है जिसे विपत्ति, विघ्न और कष्टों के निवारण के लिए उल्लेखित देव, तीर्थंकर या देव-समूह के नामों को स्मरण करके पढ़ा/जापा जाता है. इसे मन्त्र-रूप में उच्चारण करने से आत्म-संयम, शान्ति और सकारात्मक असर माना जाता है, न कि किसी “त Tantra” के क्रियायोजन के रूप में.
- Tantra (त Tantra): Jain धर्म में Tantra-आचार-प्रथा सामान्य नहीं मानी जाती; अधिकांश स्थितियों में Tantra, जादुई-यन्त्र-आतिशय/कहिए Tantra-संयम Jain-धर्म के अनुरूप नहीं माने जाते. “Tantra से Uvasaggaharam Stotra कैसे chants करें” जैसी बात व्यापक तौर पर Jain-शास्त्रों के अनुसार नहीं मानी जानी चाहिए. इसका सहीload वही है जो Stotra का पाठ/जप है, न कि किसी अलौकिक-उपाय या तन्त्र-युक्त क्रिया।
संस्करण-भिन्नता (Digambar बनाम Shwetambar): Uvasaggaharam Stotra के मूल पाठ और उद्देश्य सामान्य रूप से समान रहता है; दायरे में कुछ पाठ-चिर-रीति में छोटे-छोटे भिन्नён (जैसे क्रम, संख्याएँ या प्रारम्भिक/समापन पाठ) हो सकते हैं, पर Tantra या Yantra के आध्यात्मिक अर्थों में Digambar और Shwetambar के बीच मूल भिन्नता नहीं होती. दोनों परम्पराओं में यह स्तोत्र विपत्ति-निवारण और पुण्य-उन्नति के लिए स्मरण/जप के तौर पर लिया जाता है।
यदि आप चाहें, मैं Uvasaggaharam Stotra का मूल पाठ (श्लोक) और उसका शुद्ध Arth Digambar और Shwetambar परंपराओं के अनुसार दे दूँ, ताकि आप दोनों रास्तों के अर्थ स्पष्ट देख सकें।