Chaturmas viday speech for sadhviji
नीचे एक सरल और सम्मानपूर्ण चतुर्थामास-विदाई भाषण दिया गया है जिसे आप सध्विजी के सम्मान में पढ़ सकते हैं।
आदरणीय सध्विजी माता, आप सभी श्रद्धालुओं के मध्य इस चतुर्मास-विहार के समापन अवसर पर मैं विनम्र श्रद्धांजलि अर्पण करता/करती हूँ।
Namaskar और जय जिनेन्द्र!
- चतुर्मास का यह आशीर्वादित काल हम सबके लिए तप, संयम और चरित्र-निर्माण का अवसर है। आपने इस अवधि में हमारे बीच धैर्य, संयम और अहिंसा के मार्ग का अनुपम महत्त्व समझाकर उसे अक्षुण्य रखा है। आपका आचरण हमारे लिए एक प्रकाश-स्तम्भ रहा है, जो हमें हर परिस्थिति में सत्य और शांति के मार्ग पर टिके रहने की प्रेरणा देता है।
- इस वर्ष के दौरान आपकी शिक्षाओं ने हमें आत्म-शुद्धि, विचार-शुद्धि और कर्म-शुद्धि के उपक्रमों से रूबरू कराया है। आपने हमारे भीतर दया, करुणा और निष्ठा के बीज बोए हैं, ताकि हम सदा उत्तम जीव-प्रेरणा के प्रति जागरूक रहें और किसी भी जीव को अप्रियता या आघात न पहुंचाएँ।
- चतुर्मास केवल विपत्तियों से बचने का नहीं, बल्कि अपने भीतर के अघटित दोषों को पहचानकर उनसे मुक्त होने का भी अवसर है। आपने हमें क्षमा-भाव, विनम्रता, और परोपकार की महत्ता समझाई है। आपकी सेवा-अनुशीलन से यह स्पष्ट होता है कि साधु-साध्वी का जीवन सिर्फ ऐश्वर्यों की प्रतीक्षा नहीं, बल्कि निर्भय सच्चाई और विवेकपूर्ण आचरण का पोषण है।
- अब समय है कि हम आपके आशीर्वाद और शिक्षाओं को अपने जीवन-सार में स्थापित करें। आपकी विदाई, वास्तव में आपके अच्छे प्रभाव को भविष्य में भी बनाए रखने का प्रशिक्षण है—ताकि हम सभी मिलकर समता, शांति और सद्ज्ञान के पथ पर चलें।
- अंत में, हमें यह याद रखना चाहिए कि जो भी पुण्य आपने इस चतुर्मास में दिया है, वह अनंत चिरकाल तक हमारे साथ रहेगा। हम आपके स्वास्थ्य, दीर्घायु और चिर-सीत्कार्य के लिए प्रार्थना करते हैं। आपका आशीर्वाद बना रहे और इस समुदाय में शांति, प्रेम और शील की धारा अविराम बहती रहे।
धन्यवाद, और आप के मंगलमय आने-जाने की मंगलकामनाओं के साथ, जय जिनेन्द्र।
यदि आप चाहें, मैं इस भाषण को शुद्ध संस्कृत पाठ, हिंदी अनुवाद, या अधिक संक्षिप्त संस्करण में भी ढाल दूँ।