भक्तामर स्तोत्र, प्राकृत भाषेत
संक्षेप में: भक्तामर स्तोत्र प्राकृत नहीं, परंपरागत रूप से संस्कृत भाषा में माना गया है। canonical (आचार्य मणतुंग) भक्तामर स्तोत्र का प्राकृत संस्करण मानकीकृत रूप से उपलब्ध नहीं है; कुछ श्रद्धालु या अनुवादक द्वार प्राकृत रूप में कुछ पाठ प्रस्तुत करते हैं, पर मुख्य और मान्य पाठ संस्कृत ही है। दिगंबर और Śvetāmbara समुदायों के हिसाब से कुल श्लोकों की संख्या अलग-अलग मानी जाती है: दिगम्बर में 48 श्लोक, Śvetāmbara में 44 श्लोक होते हैं (interpolated श्लोकों के होने की परंपरा भी है)। ( en.wikipedia.org)
भक्तामर स्तोत्र का पहला श्लोक (संस्कृत पाठ) भक्तामर-प्रणत-मौलि-मणि-प्रभाणा- मुद्योतकं दलित-पाप-तमो-वितानम्। सम्यक्-प्रणम्य चिन-पाद-युगं युगादा- वालम्बनं भव-जले पततां जनानाम्।
arth (संक्षेप अर्थ)
- जिनेंद्रदेव (आदििनाथ) के चरणों में श्रद्धा-भक्ति की माला मंचक, पवित्र मणि-भंगिमाओं के प्रकाश से पाप-तम का अन्धकार धीरे-धीरे मिटता है।
- जो श्रद्धालु सचेत होकर इन पादों को प्रणाम करते हैं, वे भव-सागर (पुनर्जन्म) में डूबते-उतरते जीवन से मुक्त होने की आशा पाते हैं।
ध्यान दें
- ऊपर दिया गया पाठ संस्कृत का मूल पाठ है; कुछ शिक्षण परंपराओं में पाठ-रचना में सूक्ष्म भिन्नताएं हो सकती हैं, पर मूल आराध्य-भाव वही रहता है।
- Digambara बनाम Śvetāmbara परंपराओं में व्याकरण-संरचना और संख्या-गत भिन्नताएं स्पष्ट रूप से दस्तावेजों में दर्ज हैं, जैसा ऊपर उल्लेख किया गया है।
आप और भी श्लोक/अर्थ चाहते हों या Prakrit-रूप के बारे में खास जानकारी चाहिए, तो मुझे बताएं। आप चाहें तो भक्तामर स्टोत्र के अन्य भागों के संस्कृत पाठ और उनके अर्थों की सरल व्याख्या भी दे सकता/सकती हूँ।