Samayik ki khetra seema kitani hai
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जैन धर्म के अनुसार, 'समायिक' (Samayik) एक महत्वपूर्ण साधना है जिसमें साधक आत्मचिंतन, ध्यान और संयम का अभ्यास करता है। समायिक के दौरान 'क्षेत्र सीमा' (Kshetra Seema) का भी विशेष उल्लेख मिलता है।
क्षेत्र सीमा (Kshetra Seema) का अर्थ: समायिक करते समय साधक को एक निश्चित सीमा (area/boundary) में ही रहना चाहिए। यह सीमा साधक के संकल्प और नियम के अनुसार निर्धारित की जाती है।
समायिक की क्षेत्र सीमा: आचार्यों ने समायिक की क्षेत्र सीमा के संबंध में बताया है—
- सामान्यतः समायिक की क्षेत्र सीमा 'एक स्थान' (एकासन) या 'दस हाथ' (लगभग 15-20 फीट) तक मानी जाती है।
- मूलतः, जिस स्थान पर समायिक का संकल्प लिया गया है, उसी स्थान (आसन या आस-पास की सीमित जगह) को उसकी क्षेत्र सीमा कहा गया है।
- समायिक के दौरान बिना अत्यंत आवश्यक कारण के उस सीमा से बाहर नहीं जाना चाहिए।
संदर्भ:
- तत्त्वार्थ सूत्र (Tattvartha Sutra)
- समायिक विधि (Samayik Vidhi)
- जैनाचार्यों की परंपरागत व्याख्याएँ
सारांश: समायिक की क्षेत्र सीमा वह निश्चित क्षेत्र है जिसमें समायिक के दौरान साधक को रहना चाहिए। सामान्यत: यह सीमा लगभग दस हाथ या एक स्थान मानी जाती है।
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