अर्हतचक्र महामंडल विधान
अर्हतचक्र महामंडल विधान एक Jain धर्म का सामूहिक पूजा-प्रणालि है, जिसे विशेषकर दिगंबर जैन समाज में अष्टान्हिका महापर्व आदि अवसरों पर किया जाता है। इसका उद्देश्य सिद्ध-चक्र (सिद्धचक्र) के भगवानों के प्रति भक्ति-पूजा से मन, वचन, काय के पवित्र संकल्पों को बढ़ाना और संसार में शांति, कल्याण और मोक्ष की राह आसान करना है।
मुख्य बातें:
- यह विधान आम तौर पर आराधना-क्रम के रूप में किया जाता है जिसमें प्रत्यक्ष पूजन, अभिषेक और अर्घ्य ( offerings) दिए जाते हैं।
- अर्घ्यों की संख्या अलग-अलग दिनों और स्थानों के अनुसार बदलती है। आम तौर पर 32, 128, 512, 1008 आदि क्रमों में अर्घ्य की कल्पना की जाती है, और कुछ आयोजनों में इनकी कुल संख्या सालाना/दिन-विशेष के हिसाब से तय की जाती है।
- यह आयोजन ज्यादातर अष्टान्हिका महापर्व के समय या सिद्धचरित्र-परंपरा के अनुसार होता है; क्षेत्रीय परंपराओं में क्रमानुसार भिन्नताएँ पाई जाती हैं।
- अलग-अलग दिगंबर बनाम श्वेतांबर परंपराओं में कुछ नियम और पाठ-क्रम भिन्न हो सकते हैं, पर मकसद वही है: भक्तिरूपी साधना से आत्मकल्याण एवं विश्व-शांति।
अगर आप चाहें, मैं इस विधान के बारे में तुलनात्मक विवरण (Digambar बनाम Shwetambar) और कुछ विद्वानों/ग्रंथों के संदर्भ भी सरल भाषा में बता सकता हूँ।