Jain swtamber anusar अनुव्रत dhari kitano daya ka palan karte he
श्वेताम्बर जैन परंपरा के अनुसार, अनुव्रतधारी (गृहस्थ) भी अहिंसा के व्रत का पालन करते हैं, हालांकि उनका पालन मुनियों की तुलना में थोड़ा सीमित होता है। अहिंसा के सिद्धांत के अंतर्गत, अनुव्रतधारी गृहस्थ को सभी जीवों—यहाँ तक कि सूक्ष्म जीवों (कीटाणु, छोटे जीव, कीड़े-मकोड़े आदि)—के प्रति दया (करुणा) और अहिंसा का पालन करना चाहिए।
अनुव्रतधारी के अहिंसा के नियम:
- वे जान-बूझकर किसी भी जीव की हत्या नहीं करते।
- वे अपने कार्यों, भोजन, जल, साफ-सफाई आदि में ध्यान रखते हैं कि अनजाने में भी कम से कम हानि हो।
- वे कीटाणुओं की अनावश्यक हत्या से बचते हैं, जैसे—जल छानकर पीना, सब्जियाँ धोकर खाना, रात में पानी न पीना आदि।
- दया और करुणा का भाव रखते हुए, वे सभी जीवों के प्रति मैत्री रखते हैं।
श्वेताम्बर जैन आगमों के अनुसार, अहिंसा और दया के ये नियम अनुव्रतधारी गृहस्थों के लिए विशेष रूप से बनाए गए हैं ताकि वे सांसारिक जीवन में रहते हुए भी आत्मा की शुद्धि और मोक्ष मार्ग पर आगे बढ़ सकें।
सारांश: अनुव्रतधारी श्वेताम्बर जैन भी कीटाणुओं (सूक्ष्म जीवों) के प्रति दया और अहिंसा का पालन करते हैं, यथासंभव उन्हें हानि पहुँचाने से बचते हैं। यही दया और अहिंसा जैन धर्म का मूल तत्व है।