There is dharma in Tiryanch panchindiya and Manushya. Than how is it possible to have bondage and vedan of kanksha mohaniya karma in all other realms
संक्षेप में Jain धर्म के अनुसार:
- हर जीव, चाहे वह तिर्यंच (उच्चिक या नीचे के) realm में हो या मनुष्य realms में, बंधन और दुख का कारण कर्म ही है। बंधन के प्रकार और अनुभव Realm के अनुसार भिन्न होते हैं, लेकिन मूल सिद्धांत वही है: जन्म-जन्मांतरों के karmic पिंजरे में फँसना।
- तिर्यंच पंक्ति (पाँच इंद्रिय—स्पर्श, स्वाद, गंध, देखने, सुनने) वाले जीवों में भी संवेदनाएँ होती हैं और वे भी कर्मों के कारण जन्म लेते और मरते हैं। “धर्म” यहाँ यह है कि ये जीव भी अपने-अपने शरीर के अनुरूप कर्मों से प्रभावित होते हैं और उनसे बंधते हैं।
- मोहनीया (मोहनिय) कर्म: यह ज्ञान-आबद्धता को धुँधला कर देता है—सत्य को गलत समझना, भ्रमित होना आदि। जब जीव के पास मोहनिया कर्म रहते हैं, तब वह सही ज्ञान नहीं पा पाता और गलत आचरण/वृत्ति के कारण कर्मों को इकठ्ठा कर बैठता है।
- काङ्क्षा (लालच/इच्छा) कर्म: ये इच्छाओं को अत्यधिक बढ़ाकर कर्म बंधन को मजबूत करते हैं। लालच से किये गये कर्मों से जीव को संसार के चक्र में फँसा रखा जाता है।
- दुख (वेदना) क्यों? हर realm में जीव अनुभव कर सकता है—तिर्यंच realms में सुख-दुख दोनों होते हैं, मनुष्य realm में अनुभव और भी विविध होते हैं। पदार्थ-आधार पर कहा जाये तो vedana/दुःख karmic बंधन के कारण ही आता है; मुक्त होने के लिये इन्हीं कर्मों को समाप्त करना पड़ता है।
- मोक्ष की राह: सभी realms के लिए एक ही मूल मार्ग है—सत्य में विश्वास (सम्यग्दर्शन), ज्ञान (सम्यक्त्व), और आचरण (सम्यकतत्व)—यानी तीन शास्त्र (Right Faith, Right Knowledge, Right Conduct) का पालन। इस मार्ग पर चलकर ही मोक्ष संभव है—जहाँ सभी प्रकार के मोहनिया और काङ्क्षा कर्मों का नाश होता है और जीव निर्गुण आत्मा बनकर liberated हो सकता है।
संक्षेप में यही है कि सभी realms के जीवों पर bondage और vedan तभी होता है जब karmic दुनिया सक्रिय रहती है; भिन्न-भिन्न इंद्रियाँ, जीवन-संघार और संस्कार होने से अनुभव-विविधता बदलती है, पर अंतत: मोक्ष केवल वही पथ अपनाकर संभव है जिसे Jain धम्म में बतलाया गया है।