ज्ञान दर्शन का व्यापार है दूसरी ढाल से है
यह वाक्य संभवतः ज्ञान-दर्शन के मूल्य और उसका उपयोग लेकर एक व्यावसायिक चिंतन की ओर इशारा कर रहा है। Jain धम्म के अनुसार:
- ज्ञान (ज्ञान-दर्शन) सबसे ऊँचा लक्ष्य है, पर उसका उद्देश्य केवल लाभ कमाना नहीं होना चाहिए; उसका असली उद्देश्य मोक्ष और जीव के कल्याण के लिए है।
- यदि ज्ञान-दर्शन को केवल व्यापार- या दाम-उपरांत लाभ के लिए इस्तेमाल किया जाए, तो वह मुख्य उद्देश्य (शुद्ध आत्म-कल्याण) से भटक जाता है।
- सही मार्ग वही है जिसमें ज्ञान को विनय, निष्कपटता और उचित आचरण के साथ ग्रहण किया जाए, और अन्य जीवों के लिए सहयोग, सेवा व आचार-वृत्ति बढ़े।
- Digambar बनाम Swetambar परंपराओं में भाष्य-व्याख्या में कुछ भिन्नताएं हो सकती हैं, पर दोनों ही मार्ग में ज्ञान का उच्च स्थान स्वीकार्य है और उसकी व्यावसायिक या स्वार्थी प्रवृत्ति से बचना जरूरी माना गया है।
संक्षेप arth (सार): ज्ञान- दर्शन का वास्तविक उद्देश्य आत्म-ज्ञान और मोक्ष है; उसे व्यापार बनाकर व्यक्तिगत लाभ के लिए इस्तेमाल करना धर्मनिष्ठ नहीं है। ज्ञान को शांति, विवेक और सेवा-भाव के साथ सीखना चाहिए ताकि जीवन-वृत्ति सही दिशा में चले और अंतःकरण शुद्ध बने।