जीव का अनादि शांत भाव कौनसा है
जीव की अनादि शांत भाव का सार यही है: जीव की मूल प्रकृति चेतना और शांतिClipboard है, पर जन्म-बन्धन के कारण वह कर्मों से आवृत्त (उत्तेजित) होता रहता है।
- सामान्य हालत में जीव kauṅ चेतना के साथ शांत नहीं रहता; कर्मों की आवृत्ति से जीव-विवेक अशांत हो जाता है और दुःख-आनंद चलता रहता है।
- जब कर्मों का संचित-वृत्त (कर्मों को समाप्त) हो जाता है और आत्मा को मोक्ष प्राप्त होता है, तब जीव स्व-स्वरूप में शांति और अनंत सुख (आनंद) में स्थित रहता है—यही वास्तविक अनादि शांत भाव है।
- धर्मशास्त्रों में इसे मोक्ष/सिद्ध-स्थिति कहा गया है: liberated soul stays in infinite bliss, मुक्त-आनंद, जन्म-मृत्यु से मुक्त।
Digambar और Shwetambar दोनों में इसे समझाते समय मूल तत्व एक ही होता है: जीव की असली शांत अवस्था मोक्ष में ही है; साधनाओं के फलस्वरूप कर्म समाप्त होते हैं और आत्मा निर्बन्ध होकर शुद्ध चैतन्य के साथ स्थिर हो जाती है।