विशानक तप क्या हे?
विशानक तप जैन धर्म में वर्णित छः बाह्य तपों (शारीरिक तपस्याओं) में से एक है। "विशानक" का अर्थ है—इन्द्रियों को विशेष रूप से संयमित करना। यह तप साधक को इन्द्रिय विषयों (रूप, रस, गंध, स्पर्श, श्रवण) से दूर रखता है और संयम का अभ्यास कराता है।
विशानक तप में साधक भोग-विलास, सजावट, सुगंध, आभूषण, मनोरंजन, मुलायम वस्त्र आदि से स्वयं को दूर रखते हैं। इसका उद्देश्य इन्द्रियों की तृप्ति में न उलझकर आत्मा की शुद्धि की ओर बढ़ना है। यह तप आत्मसंयम, त्याग और साधना का मार्ग प्रशस्त करता है।
संक्षेप में, विशानक तप का अर्थ है—इन्द्रिय विषयों और भोग-विलास की वस्तुओं का त्याग करके आत्मकल्याण की ओर बढ़ना।