लोकान्तिक वचने करी, वरस्या वरसी दान, करकांड े प्रभु पूजना, पूजो भवि बहुमान |
ये श्लोक नवAng Puja (Nav Ang Jin Pooja) के अंश हैं. नौ अंगों में जिनमूर्ति की पूजा करने की एक बहुत पुरानी साधना है, जिसमें हर अंग के लिए एक छोटा-सा श्लोक कहा जाता है और उसी अंग के अनुसार दान-चिन्तन का संकल्प किया जाता है.
सरल अर्थ (arth):
- पहले दो चरण: दाहिने पैर के अंगूठे और बाएं पैर के अंगूठे से नमस्कार करें, अर्थात Arihant (जिन) को प्रणाम।
- इसके बाद घुटनों से नमस्कार: Siddhāों (कृतज्ञात्माओं) को प्रणाम।
- फिर हाथों से प्रणाम: Āyariyāṇaṁ (आचार्यों/उपाध्यायों) का सम्मान।
- कंधों से नमस्कार: अवज्जायाण (धर्म के संरक्षक) को प्रणाम; अहंकार और भय से मुक्त होने का संकेत।
- शीर्ष/माथे पर नमस्कार: मुक्ति के प्रतीक सिद्धशिला गुनों को सम्मान।
- कपाळ (कपाल) पर नमस्कार: तीर्थंकर पद और त्रिभुवन के हित के लिए पुण्य को याद रखना।
- गला से नमस्कार: प्रभु की मधुर वाणी और आचरण का स्मरण।
- छाती पर नमस्कार: हृदय की शुद्धि, राग-द्वेष का त्याग और सहजता।
- नाभि पर नमस्कार: तीन रत्न (सकल द्रष्टि, ज्ञान, आचार) की उज्ज्वलता का स्मरण।
यह क्रम (9 अंग) के अनुसार हर अंग के लिए एक छोटी स्तुति/दोहा भी पढ़ी जाती है और फिर निष्काम दान, भक्ति आदि की भावना संकल्पित की जाती है।
धारणा में फर्क:
- Digambar और Śvetāmbara परंपराओं में पाठ और क्रम में हल्का-सा फर्क होता है; किन श्लोकों को कौन से अंग के साथ जोड़ा गया है, यह स्थानीय दूरसर/गुरु के अनुसार थोड़ा अलग हो सकता है। मूल भाव यही है: विनय, अहिंसा, विज्ञान और मोक्ष की ओर प्रवृत्ति।
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