Aayushy Karm bandhan kam jyada hone ka karan
संक्षेप में Jain धर्म के अनुसार Aayu (जीवन की आयु) और कर्म-बांधन (कर्मों के बंधन) के बारे में यह है कि:
- कर्म हमारे कर्मों के अनुसार ही soul पर बंधते हैं; जो सोच-भावना और कर्मो के रूप में आते हैं, वही आयु-परिमाण और बंधन तय करते हैं।
- यदि जीवन में अहिंса, सत्य, असत्य न बोलना, चोरी न करना, ब्रह्मचर्य, और आसक्ति-न्यूनता जैसे आचार-व्यवहार निभाते हैं, तो नए कर्म कम बनते हैं और पुरानी बंधन सुधरते (पवित्र होते) रहते हैं; वहीं प्रत्यक्ष हिंसा, क्रोध, छल, लोभ, मनायी-कुल closure आदि से अधिक कर्म जमा होते हैं और bondage बढ़ता है।
- इसलिए आयु कम या ज्यादा होने का असल कारण वर्तमान जीवन में किए गए कर्मों की प्रकृति है: नकारात्मक या हिंसात्मक विचार/कर्म अधिक बनाते हैं और सकारात्मक, शीलपूर्ण आचरण कम बनाते हैं, इस कारण बंधन भी अधिक होता है।
- Jain साधना-मार्ग में पाँच महाव्रत, पक्का विचार, तप, प्राण-शुद्धि, सम्यक् क्षमा-वृत्ति, और सम्यक् प्रकरण आदि के द्वारा karm फेह (पावन) होते हैं और आत्मा का मोक्ष सरल होता है।
डिगंबर बनाम श्वेतांबर के बीच प्रमुख भेद:
- कर्म-सिद्धांत की मूल धारा दोनों ही समान मानते हैं: कर्म क्या हैं, वे कैसे बंधते हैं, और कैसे निश्चय से मुक्त होते हैं—ये दोनों ट्रडिशनों में एक ही हैं।
- व्यवहारिक पाठों में कुछ साधु-साध्वी-आचरणों और परंपराओं में भिन्नताएं हो सकती हैं, पर कर्म-बांधन के महत्व और आत्मा के मोक्ष के मार्ग के बारे में بنیادی धारणा समान रहती है।
नोट:
- अगर आप चाहें तो मैं इस विषय पर मूल Jain ध्वनि-संस्करण (sutra/stotra) के शब्दों के साथ अर्थ भी सरल शब्दों में समझा सकता हूँ। यदि आप Digambar/Shwetambar के विशेष भेदों के बारे में गहरी जानकारी चाहते हैं, बताइए मैं उसी अनुसार स्पष्ट कर दूँगा।