Polar nights with 65days of continuous nights have started, with no sun visibility. How does this prove that earth is flat as per Jainism?
जैन धर्म में स्पष्ट बात यह है:
- जैन लम्बाकाश (लोक) का सांस्कृतिक-धार्मिक ढांचा एकDisk-सी कलात्मक तस्वीर मानता है जिसमें पृथ्वी शीर्ष-मैदान (महायग) और माउंट मेरु जैसी धारणा प्रमुख है। इसे “पृथ्वी गोल/गोलार्ध” के आधुनिक विज्ञान के मॉडल के साथ मिलाने से पहले समझना चाहिए।
- वाजपेयी दर्शन के अनुसार पृथ्वी और ब्रह्मांड की संरचना के बारे में अनेक विवरण Digambar और Śvetambar दोनों परंपराओं में मौजूद हैं, परंतु दोनों ही बताते हैं कि लोक एक स्थिर, धरातलीय-भूखंड है जिसका केंद्र मेरु है और उसके चारों ओर महा-समुद्र, महा-राज्य और अन्य भूखंड हैं। यह आधुनिक ग्रह-आकृति के समान नहीं है, परन्तु इसे Flat Earth जैसे सीधे-सीधे आधुनिक दावे के रूप में नहीं समझना चाहिए—यह एक धार्मिक-दर्शनिक कल्पना है।
संक्षेप में:
- जैन धर्म में पृथ्वी की flat-जगह (या disk जैसी कल्पना) एक धार्मिक-धार्मिक-संरचना के रूप में आती है, न कि आधुनिक भूगोल-सम्मत निष्कर्ष के रूप में।
- polar night जैसी घटनाओं को पृथ्वी के रंग-रूप का प्रमाण नहीं माना जाता; यह एक भौतिक-तर्क के बजाय धार्मिक-वतरण-व्याख्या का विषय है।
- Digambar और Śvetambar दोनों में इस विषय पर मूल विचार एक-जैसा रहता है, लेकिन भाषा-शैली और कुछ तात्पर्य में हल्के अंतर मिलते हैं। स्पष्ट उद्देश्य वही है: संसार और जीव-तत्वों के वास्तविक सार को समझना, न कि आधुनिक विज्ञान की भाषा से पृथ्वी-आकार का निर्धारण।
अगर आप चाहें, मैं अधिक सरल शब्दों में जैन लाकाओं का छोटा सार और मेरु-चक्र की सामान्य कल्पना दे सकता हूँ।