प्रभु प्रतिष्ठा के समय जिस प्रभु का नाम गर्भगृह में लिखा जाता है वह प्रभु का तीर्थ
प्रभु प्रतिष्ठा के समय गर्भगृह में जिन प्रभु की प्रतिमा प्रतिष्ठित की जाती है, उस प्रतिमा के नीचे या गर्भगृह में जिन प्रभु का नाम लिखा जाता है, वह "मूलनायक" कहलाते हैं। मूलनायक का मतलब है - वह तीर्थंकर जिनकी प्रतिमा मुख्य रूप से मंदिर के गर्भगृह में प्रतिष्ठित की गई हो।
इसका अर्थ यह नहीं कि वह प्रभु किसी विशेष तीर्थ से संबंधित हैं, बल्कि वह उस मंदिर के "मूलनायक" प्रभु हैं। अक्सर प्रतिष्ठा के समय पुरोहित या आचार्य द्वारा मंत्रोच्चार के साथ गर्भगृह में प्रभु का नाम लिखा जाता है और वही उस स्थान के लिए प्रधान माने जाते हैं।
यदि आप पूछ रहे हैं कि "वह प्रभु का तीर्थ कौन-सा होगा"—तो सामान्यतः प्रतिष्ठा के समय जिस तीर्थंकर की प्रतिमा स्थापित होती है, उनके जन्म, तप, ज्ञान, मोक्ष आदि कल्याणक स्थल को उनका तीर्थ कहा जाता है। उदाहरणस्वरूप, यदि श्री महावीर स्वामी की प्रतिमा प्रतिष्ठित हुई है, तो उनका तीर्थ क्षत्रियकुंड, पावापुरी आदि माने जाएंगे। इसी प्रकार अन्य तीर्थंकरों के लिए भी उनके कल्याणक स्थल तीर्थ के रूप में माने जाते हैं।
संक्षिप्त उत्तर: गर्भगृह में जिसका नाम लिखा जाता है, वह उस मंदिर के "मूलनायक" तीर्थंकर होते हैं, और उनका तीर्थ वह स्थान है जहाँ उनके कल्याणक (जन्म, तप, ज्ञान, मोक्ष) हुए हैं।