श्वेतांबर मान्यता में मनुष्य कितने देर लोक तक जा सकता है
श्वेतांबर मान्यतानुसार मनुष्य के जन्म-जीवन के बाद आत्मा के गति-मार्ग कर्मों पर निर्भर होते हैं। “लोक”ों में रहने की अवधि fixed नहीं है; ये karma के परिणाम के अनुसार एक-एक अनुरूप समय तक रहती है और फिर नया जन्म या मोक्ष हो सकता है।
मुख्य बाते:
- लोक दो प्रकार के हैं: ऊपर के देवलोक (स्वर्गीय लोक) और नीचे के नरकलोक आदि। इन सबमें रहने की अवधि कर्मों के परिणाम से निर्धारित होती है, कभी-कभी बहुत छोटा समय और कभी असंख्य वर्षों तक भी हो सकता है।
- मोक्ष केवल एक ऐसा अंतिम लक्ष्य है जिसमें जन्म-जन्तु के चक्र से पूर्ण रूप से मुक्ति मिलती है; तब आत्मा को फिर किसी लोक में जन्म नहीं लेना पड़ता।
- श्वेतांबर- Digambar दोनों प्रमुख परंपराओं में यह विचार समान है: कर्म के अनुसार ही आत्मा का लोक और जीवनकाल तय होता है; फर्क छोटे-छोटे पाठ-ग्रंथों में लोकों के वर्णन में आ-जा सकता है, पर मूल सिद्धांत एक ही है।
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