maan ko kiski upma di gayi hai
Jain dharm mein Maan (सम्मान/आडंबर नहीं) ya अहंकार को पांच मोहसीन अवस्थाओं में से एक माना गया है। यानी Maan को कपट-राग, लोभ आदि के साथ एक अहंकारी भाव मानकर उसका कर्मकुंड बनना बताया गया है।
संक्षेप में:
- Maan यानी अहंकार एक दृढ़ पाप है जो जीव के कर्म बनाता है और तत्त्वज्ञान से दूर ले जाता है।
- इसे सच्चाई, विनम्रता और आत्मज्ञान से दूर करने के लिए अभ्यास किया जाता है: नम्रता, क्षमा, विवेक, और आत्म-नियमन।
- दिगंबर और श्वेतांबर दोनों परम्पराओं में Maan की भूमिका एक ही प्रकार से बताई जाती है: यह आत्मा के मोक्ष के रास्ते में बाधक है और उसे त्याग कर विनम्रता अपनानी चाहिए।
अगर आप चाहें, मैं Maan से relatedspecific श्लोक/उपमा (उदाहरण) दे सकता हूँ और उनके अर्थ भी साफ-साफ बताऊँगा।