char kashay ki upma
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चार कषाय (चार कषाय) Jain धर्म के चार प्रमुख मानसिक शत्रु हैं:
- राग (attachment) — जैसे पक्व मीठे फल की चाह में मन चिपका रहता है, वही राग हमें संसार के कर्मों में बाँधता है।
- द्वेष (aversion) — नफरत या घृणा की चुभन से दिल चुभता है और दूसरों के प्रति दुष्प्रवृत्ति बनती है।
- मोह (delusion) — भ्रम और अज्ञान से मार्ग अस्पष्ट होता है; सच-झूठ की समझ धुँधली पड़ जाती है।
- क्लेद (krodh/anger) — क्रोध आग की तरह अपने ही घर को जला देता है; क्रोध में किया गया कर्म तुरंत स्मृतियों को दूषित कर देता है।
इन चारों कषाय से मन अक्सर अशुद्ध होता है और इससे कर्म बंधन बढ़ते हैं। प्रभावी रास्ता है:
- संयम और साधना (आचरण), सत्संगति, गहन अध्ययन,
- सही विश्वास-ज्ञान-चारित्र (रत्नत्रय) को स्थापित करना,
- ब्रह्मचर्य, विहार और पिछले कर्मों को तुटाने के लिए तप, प्राणायाम और विपश्यना जैसी साधनाएं करना।
Digambar और Shwetambar परंपराओं में चारों कषाय की समझ और उनके परिणामों की व्याख्या एक जैसी होती है, सिर्फ कुछ शब्दावली या अभ्यास में लघु भिन्नताएं हो सकती हैं। इन चारों को कम करने या मिटाने के लिए Jain साधना और विचार-विमर्श से आत्मसंयम अपनाने की शिक्षा दी जाती है।