why DID division of Śvetāmbara & Digambara happen in induia
संक्षेप में उत्तर: Śvetāmbara और Digambara द्वय की विभाजन முறयॉं कई शताब्दियों में धीरे-धीरे विकसित हुईं। यह एक एकल समय का असल “एक बिंदु” नहीं था, बल्कि अभ्यासों, ग्रंथ-स्वीकृतियों और साधना-रणनीतियों के भिन्न-भिन्न रंगों का संगम था।
मुख्य कारण (सरल सरल विवरण):
- प्रेरक प्रवास और famine के बाद दो समूहों का पृथक्करण: एक समूह Magadha के उत्तर में रहा और एक दक्षिण की ओर गया ताकि महावीर के समय से चली आ रही परंपरा को बचाया जा सके। बाद में इन दोनों समूहों के बीच वस्त्र-प्रथाओं और साधना-मीमांसा पर भिन्न राय उभर गई। Digambara इसे “स्त्री से मोक्ष संभव है” और Naked (पूर्ण निर्वस्त्र) साधकों की प्रथा से जोड़ा, जबकि Śvetāmbara ने वस्त्र-धारण को स्वीकार किया। ( britannica.com)
- लिखित ग्रंथों की मान्यता का मुद्दा: Śvetāmbara ने Vallabhi परिषद के बाद मानक आचार-विधि (आगमों) को गढ़ लिया, जबकि Digambara इन्हें मूल आगम मानने से इनकार करते हैं और अपने बाद के ग्रंथ-समूह पर निर्भर रहते हैं। इस कुख्यात ग्रंथ-स्वीकृति के अंतर से विभाजन मजबूत हुआ। ( britannica.com)
- साधकों की प्रकृति और चरित्र-विश्वास: Digambara साधक नग्न रहते हैं (विशेषकर मोक्ष के लिए पूर्ण निर्वस्त्र होना मानते हैं), Śvetāmbara साधक पुरुष और महिलाएँ दोनों के लिए वस्त्र-धारण को मानते हैं। महिलाओं के मोक्ष-सम्भावना को लेकर दोनों में भी दृष्टिकोण भिन्न है। ( britannica.com)
ऐसा माना जाता है कि विभाजन की प्रक्रिया 1st century CE के आसपास शुरू हुई थी और 5th–6th century CE के Vallabhi Council के समय पर इसकी स्पष्ट रेखा खींच दी गई थी। Digambara ने उस परिषद में भाग नहीं लिया और अपने अपने रचनात्मक-आचार-संहिताओं पर कायम रहे। इस तरह विभाजन स्थिर और स्पष्ट हो गया। ( britannica.com)
नोट—दोनों संप्रदाय के भीतर भी अलग-अलग उप-स्कूल/मत-मंथन होते रहे हैं, पर मूल नैतिक शिक्षाएं (अहिंसा, अपरिग्रह, अनेकांतवाद) वही रहती हैं।
You can read more in general histories of Jainism about this division and the main doctrinal differences.