Sansara saram jal
संस्कारिक बातों में “Sansara Saaram Jal” जैसा शब्द जापानी/हिंदू भक्ति गीतों में अक्सर आता है, पर यह Jain धर्म का मूल पाठ नहीं है। Jainism में संसार (samsara) को जन्म-त्याग, पाप- पुण्य के फटे-फटे चक्र के रूप में समझा जाता है, और उसका सार जल आदि किसी पदार्थ से नहीं, बल्कि अहिंसा, सत्य, हीन- मोह आदि गुरुओं पर टिके ज्ञान-निर्मल रास्ते से मोक्ष की दिशा से जोड़ा जाता है।
असल बात सरल शब्दों में:
- संसार (sansara) मतलब जन्म- death- पुनर्जन्म का चक्र; इसे रोकना या तोड़ना मोक्ष है।
- Jain शब्दावली में इसके सार को पानी जैसी חומר-धारा से नहीं जोड़ा जाता; उसका मूल मतलब है आत्मा के कर्मों के कारण सापेक्ष बंधन और उसका समाधान।
- किसी विशेष श्लोक में “Sansara Saaram Jal” जैसा शब्द हिंदू शास्त्रों के शिव-भक्ति पाठों में दिखाई देता है, Jain ग्रंथों में यह उसी रूप में नहीं मिलता।
अगर चाहें, मैं Jain धर्म के किसी खास स्तोत्र/सूत्र के बारे में पक्का स्रोत लेकर बतला सकता हूँ (जैसे त pacifist/आचार-विधान से जुड़ा मोक्ष-मार्ग, तृण-त्रय आदि के बारे में) और Digambar बनाम Shwetambar के मतानुसार अगर भिन्न अर्थ होते हों तो उसे भी स्पष्ट कर दूँ।
संक्षेप में: “Sansara Saaram Jal” Jain ग्रंथों से जुड़े एक प्रमाणित पाठ के रूप में प्रसिद्ध नहीं है; Jain दृष्टिकोण में संसार का सार कर्मों से बंधन और मोक्ष की चाह है, जल-चीज से नहीं।
अगर आप चाहें तो मैं JainKnowledge की संगत पेज खोजकर उसके अनुसार जोड़ दूँ।