गृहीत एवं अग्रहीत मिथ्यात्व
मिथ्यात्व (mithyatva) Jain दर्शन में “गलत मान्यता/अवास्तविक धारणा” को कहते हैं। यह उस स्थिति को दर्शाता है जिसमें आत्मा सही ज्ञान, सही दर्शन और सही आचरण से वंचित रहकर गलत विचार रख लेती है।
गृहीत मिथ्यात्व और अग्रहीत मिथ्यात्व इस विषयक कुछ सूत्रों में प्रयुक्त शब्द हैं:
- गृहीत मिथ्यात्व (grihit mithyatva): वह मिथ्यात्व जिसे मनुष्य अपने जीवनस्थल, गृहस्थ जीवन, परिवार आदि से जुड़कर या worldly attachment के कारण स्थिर/जड़ मान लेता है। यानी ऐसी धारणा जो संसारिक सुख-सुमन के आसक्ति से दृढ़ता से पकड़ ली गई हो।
- अग्रहीत मिथ्यात्व (agrāhit mithyatva): वह मिथ्यात्व जिसे यदि व्यक्ति स्वतंत्र होकर आचार-व्रत और निर्वाण के मार्ग की ओर बढ़े तो पकड़ नहीं पाता, या जहां अभी उसे सत्य ज्ञान की पकड़ नहीं मिली होती—यानी अभी ग्रहण करने योग्य (उन्नत करने योग्य) मिथ्यात्व।
ध्यान दें:
- मिथ्यात्व का मूल प्रभाव “सत्य ज्ञान” (सम्यता-दर्शन, सम्यक् ज्ञान) से वंचित रखना है।
- जैन साधना में मिथ्यात्व को तीन रूपों में समझा जाता है: गलत दर्शन (सम्यक दर्शन की कमी), गलत ज्ञान (सम्यक ज्ञान की कमी), और गलत आचरण (सम्यक आचरण की कमी)। मिथ्यात्व इन तीनों के कारण बन सकता है।
- Digambar और Shwetambar के हवाले से शब्दावली और परिभाषाओं में मतान्तर हो सकता है; पर उद्देश्य समान रहता है: सत्य के विरुद्ध गलत मान्यताएँ।
यदि आप चाहें, मैं इन शब्दों के संकेतस्थ शब्द और प्रमुख सूत्र (जो Digambar/Shwetambar पर निर्भर होते हैं) के बारे में सरल, स्पष्ट arth दे सकता हूँ—बस बताएँ कि आप किस प्रकार के संदर्भ (सूत्र/स्तोत्र) के साथ चाहेंगे।