अगर कच्चा पानी पीने से जीव की हिंसा नहीं होती है तो पानी गरम करने में जीव की हिंसा नहीं होती है
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संक्षेप में: दोनों ही रास्तों में जीव-जंतुओं पर हिंसा होती है, क्योंकि जल में सूक्ष्मजीव भी रहते हैं और वे किसी न किसी रूप में חיים के प्रतीक हैं।
- Raw water (कच्चा पानी): इसमें सूक्ष्मजीव हो सकते हैं; उन्हें पिलाने से भी हिंसा होती है, चाहे नज़र में छोटा जीव नजर न आये।
- Water को गर्म करना/उबालना: यहाँ भी जीव-जंतुओं (सूक्ष्मजीवों) को मारना होता है, इसलिए यह भी हिंसा ही है।
जैन धर्म का उद्देश्य कम से कम हिंसा करना है। अतः व्यावहारिक रूप से हिंसा को कम से कम करने के उपाय चुनने चाहिए:
- पानी को साफ करने के ऐसे तरीके अपनाएं जो जीव-जंतुओं पर न्यूनतम हिंसा करें (जैसे साफ-सफाई के बाद उचित फिल्टरिंग, सूर्य से शुद्धिकरण आदि, जहां संभव हो)।
- अगर कोई आवश्यक हो तो जल को सुरक्षित बनाने के लिए उबालना एक विकल्प हो सकता है, लेकिन इसे भी हिंसा मानकर ही किया जाए और बाकी उपायों को प्राथमिकता दी जाए।
ध्यान दें: विविध दीं में व्यावहारिक सुझावों में भिन्नता हो सकती है; अगर आपDigambar बनाम Shwetambar पर स्पष्ट भिन्नता चाहते हैं, तो मैं उसी के अनुसार सटीकarth दे सकता/सकती हूँ।