जैन धर्म के अनुसार नवकारसी पोर्शी और 74c किस लिए करते हैं और इसका अर्थ क्या है
जैन धर्म में "नवकारसी", "पोर्शी" और "74c" तीनों ही महत्वपूर्ण धार्मिक नियम (व्रत) हैं, जो आहार (भोजन) के समय और संयम से जुड़े हुए हैं। इनका मुख्य उद्देश्य आत्मा की शुद्धि, अहिंसा, संयम और ध्यान का अभ्यास करना है।
1. नवकारसी (Navkarsi): नवकारसी का अर्थ है—दिन के शुरू होने के बाद (सूर्योदय के बाद) नवकार मंत्र का जाप करने के बाद ही पहला आहार (भोजन या पानी) ग्रहण करना। नवकारसी में सूर्योदय के बाद कम-से-कम 48 मिनट (लगभग 1 घड़ी) तक कुछ भी नहीं खाते-पीते। इस समय में साधक नवकार मंत्र का जाप करते हैं और आत्म-शुद्धि का प्रयास करते हैं।
2. पोर्शी (Porsi): पोर्शी का मतलब है—सूर्योदय के 3 घंटे (लगभग 2 घड़ी या 2 घंटे 24 मिनट) बाद पहला आहार या जल ग्रहण करना। इसका उद्देश्य संयम को और अधिक बढ़ाना है। जो साधक और अधिक संयम का पालन करना चाहते हैं, वे पोर्शी करते हैं।
3. 74c (Saat-Chaudas): 74c का अर्थ है—सूर्योदय के 4 घंटे 48 मिनट (लगभग 3 घड़ी 36 मिनट) बाद तक उपवास करना, यानी इस अवधि में कुछ भी नहीं खाना-पीना। इसके बाद ही आहार या जल ग्रहण किया जाता है। यह संयम का और भी कठिन स्वरूप है, जिसमें आत्म-नियंत्रण और साधना को सर्वोच्च स्थान दिया गया है।
क्यों किया जाता है?
- आत्म-शुद्धि एवं संयम के लिए।
- शरीर और आत्मा के संबंध को समझने के लिए।
- दिन का आरंभ धार्मिक भावना, नवकार मंत्र के जाप और ध्यान से करने हेतु।
- भोजन के प्रति जागरूकता और आवश्यकता से अधिक न खाने की भावना।
- अहिंसा की भावना—सुबह का भोजन अधिक सूक्ष्म जीवों से रहित होता है, जिससे जीव-हिंसा कम होती है।
अर्थ: इन नियमों के पालन से जैन साधक संयम, तप, और आत्म-नियंत्रण की ओर अग्रसर होते हैं, जिससे आत्मा की शुद्धि और मोक्ष मार्ग की ओर अग्रसर होने में मदद मिलती है। यह जैन धर्म के मूल सिद्धांतों—अहिंसा, संयम, और तितिक्षा—का अभ्यास है।
सारांश: नवकारसी, पोर्शी और 74c—तीनों ही जैन धर्म के आहार संयम के विशेष नियम हैं, जो आत्मशुद्धि, संयम, और मोक्ष की ओर अग्रसर होने के लिए किए जाते हैं।