Chaityavandan Vidhi give
Chaityavandan Vidhi normally means the full temple avashyak / chaitya‑vandan sequence (mainly Śvetāmbara Mūrtipūjak tradition). I’ll give you a simple, practical vidhi – not every single long sūtra text, but a clear step‑by‑step you can actually follow.
If you want the full original sūtras line‑by‑line, tell me your tradition (e.g. “Śvetāmbara Mūrtipūjak”) and I’ll write the detailed text in order.
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1. तैयारी (Preparation)
- स्नान करें, साफ़ (सफ़ेद) कपड़े पहनें।
- मुँहपट्टी, पाटो (आसन) आदि ले लें (यदि आपकी परम्परा में हो).
- मन में निश्चय करें – “अभी मैं केवल जिनेन्द्र‑भक्ति में रहूँगा, संसारिक विचार छोड़ूँगा।”
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2. देवालय में प्रवेश – तीन “निस्सीहि”
- मंदिर के बाहर के दरवाज़े पर – पहली निस्सीहि
- अर्थ: “मैं बाहर के सब संसारिक काम‑धंधे त्यागता हूँ।”
- गर्भगृह/मुख्य भाग के अंदर पहुँच कर – दूसरी निस्सीहि
- अर्थ: “अब मैं और सूक्ष्म संसारिक चिंताएँ भी छोड़ता हूँ।”
- वेदी / भगवान के समीप – तीसरी निस्सीहि
- अर्थ: “अब मेरा चित्त केवल जिनेन्द्र में ही लगे, बाकी सब त्यागूँ।”
(शब्द अलग‑अलग पुस्तक में थोड़े बदल सकते हैं, पर भाव यही है – तीन बार “निस्सीहि, निस्सीहि, निस्सीहि …”)
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3. प्रदक्षिणा (Pradakṣiṇā)
- वेदी या गर्भगृह की ३ बार प्रदक्षिणा करें।
- हाथ जोड़कर, शांत गति से, भगवान के गुणों का चिंतन करते हुए।
- भाव: “मैं जन्म‑मरण के चक्र से निकलकर सिद्धपद की ओर बढ़ना चाहता हूँ।”
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4. दर्शन और प्रणाम
- शांत खड़े होकर भगवान का दर्शऩ करें।
- पञ्चांग प्रणाम (या अष्टाङ्ग, जिस प्रकार आपकी परम्परा हो):
- घुटनों के बल या भूमि पर लेटकर, पाँच अंग/आठ अंग से नमस्कार। - भाव: “हे अरीहंत‑परमात्मा! मैं अहंकार छोड़कर आपके चरणों में नतमस्तक हूँ।”
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5. आसन ग्रहण – समायक‑भाव
- स्वच्छ आसन पर बैठें (पद्मासन / सुखासन, जो संभव हो)।
- शरीर सीधा, आँखें हल्की बंद, थोड़ी देर शांत बैठें।
- कम से कम २‑३ मिनट मन को स्थिर करें – इसे समायक‑भाव मान सकते हैं (पूरा औपचारिक समायक अलग होता है, पर यहाँ उसका भाव लिया जाता है)।
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6. नवकार मंत्र (Namokār Mantra)
- नवकार मंत्र एकाग्रता से बोलें (बहुत लोग ९ बार बोलते हैं):
> णमो अरहंताणं > णमो सिद्धाणं > णमो आयरियाणं > णमो उवज्झायाणं > णमो लोए सव्वसाहूणं। > > एसो पंच नमोकारो, सव्वपावप्पणासणो। > मंगलाणं च सव्वेसिं, पडमं हवई मंगलं॥
सरल अर्थ: मैं अरिहन्त, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और सभी साधु‑साध्वी को नमस्कार करता हूँ। यह पाँच‑पैरों वाला नमस्कार सभी पापों का नाश करने वाला और सब मंगलों में श्रेष्ठ मंगल है।
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7. चौवीसथो / लोगस्स (Caturviṃśati‑stava – Logassa)
अब २४ तीर्थंकरों की स्तुति का पाठ होता है, जिसे प्रायः “लोगस्स सूत्र” (Logassa) कहा जाता है। पूरी प्राकृत स्तुति बहुत लंबी है, इसलिए यहाँ केवल आरम्भिक पंक्तियाँ और भाव:
> णमो अरिहंताणं, णमो सिद्धाणं … (नवकार के बाद) > लोगस्स उव्वीज्जए, धम्मत्थाए महेसिणो …
भाव: मैं पूरे लोक में विराजमान जिनराजों को नमस्कार करता हूँ, जो धर्म की सच्ची स्थापना करने वाले महान ऋषि हैं। इसमें क्रम से २४ तीर्थंकरों की वंदना की जाती है।
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8. वंदना (Sadhu‑Vandana / Panch‑Parameṣṭhī Vandana)
- पंच‑परमेष्ठी की मानसिक या वाचिक वंदना।
- यदि साधु‑साध्वी उपस्थित हों और आपकी परम्परा में हो, तो उनके पास जाकर औपचारिक वंदना (जय जिनेन्द्र, चरणस्पर्श, उचित मर्यादा में) की जाती है।
- नहीं हों तो, “सभी साधु‑साध्वी को मैं नमस्कार करता हूँ, उनकी आज्ञा में रहूँ” – ऐसा भाव करें।
सरल पारंपरिक पंक्ति (अर्थ): “हे गुरुदेव! मेरे द्वारा जाने‑अनजाने, मन‑वचन‑काय से हुई भूलों को क्षमा करें; मुझे सम्यक‑दर्शन‑ज्ञान‑चरित्र की ओर मार्गदर्शन करें।”
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9. अवस्थाचिंतन (Avasthā‑Chintan)
यह भाग कुछ पुस्तकों में विस्तार से मिलता है –
- गरbha‑avasthā (गर्भ अवस्था),
- janma‑avasthā (जन्म अवस्था),
- divya‑desa‑avasthā (सम्यक दर्शन‑ज्ञान के बाद की दिव्य स्थिति)
सरल भाव: “भगवान भी पहले जीव थे, उन्होंने तप, संयम और त्याग से कर्मों को घटाया, और आज सिद्धपद को प्राप्त हुए। मैं भी उनके जैसे गुणों को अपनाने का संकल्प करूँ।”
यदि पूरा सूत्र याद न हो तो, थोड़ी देर चुप बैठकर भगवान के तीनों मुख्य चरण – १. संसार में जीव रूप २. तप‑संयम से चारित्रवान साधु रूप ३. अंत में सिद्ध रूप का ध्यान कर लें।
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10. क्षमापना / मैत्री‑भाव (Forgiveness & Friendship)
आमतौर पर यहाँ या प्रातिक्रमण में बोला जाता है:
> “खम्मेमि सव्वे जीवा, सव्वे जीवा खमंतु मे। > मित्ति मे सव्व भूएसु, वेरं मज्झं न केणई॥”
अर्थ (बहुत सरल): मैं सब जीवों को क्षमा करता हूँ, सब जीव मुझे क्षमा करें। सब प्राणियों से मेरी मैत्री हो, मेरा किसी से वैर न हो।
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11. कायोत्सर्ग (Kayotsarga – शारीरिक स्थिरता)
- खड़े होकर या बैठकर, शरीर को पूरी तरह स्थिर रखकर, कुछ समय कायोत्सर्ग करें।
- आँखें हल्की बंद, ध्यान – “मैं शुद्ध आत्मा हूँ, शरीर, इन्द्रियाँ, मन अलग हैं।”
- शुरुआत में २–५ मिनट भी पर्याप्त हैं, धीरे‑धीरे बढ़ा सकते हैं।
छोटी पंक्ति (यदि आपकी परम्परा में हो):
> “इसरी भावे, णिव्वूं भावे …” इत्यादि।
भाव: देह‑संबंधी कषायों से ऊपर उठकर, आत्मा के शुद्ध, ज्ञानस्वरूप का स्मरण।
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12. मंगल पाठ / समापन
अंत में सबके कल्याण की मंगल भावना करें। सरल मंगल:
> “सभी जीवों को सही सम्यक‑दर्शन मिले, > सही ज्ञान और सही आचरण से वे भी दु:खों से मुक्त होकर सिद्धपद प्राप्त करें।”
या कोई छोटा श्लोक/स्तुति जो आपके घर/मंदिर में प्रचलित हो, पढ़कर शांत‑भाव से उठें, पीछे न होकर, बाएँ/दाएँ हटकर बाहर जाएँ (सम्मान के साथ).
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परम्परा के अंतर (बहुत संक्षेप में)
- श्वेताम्बर मूर्तिपूजक: ऊपर जैसा पूरा chaityavandan‑vidhi पुस्तकों में तय क्रम के साथ चलता है (निस्सीहि, प्रदक्षिणा, नवकार, लोगस्स, अवस्थाचिंतन, वंदना, कायोत्सर्ग आदि)।
- स्थानीय गच्छ / संप्रदाय के अनुसार सूत्रों का क्रम या शब्द थोड़ा बदल सकता है – अपने मंदिर की पुस्तक मानें।
- दिगम्बर परम्परा में “चैत्यवंदन” नाम से अलग स्थिर लिटर्जी कम प्रचलित है; वहाँ देव‑पूजा, अभिषेक, स्तोत्र‑पाठ, ध्यान आदि अधिक चलते हैं। पर भाव वही – जिनेन्द्र‑भक्ति, आत्म‑शुद्धि, और क्षमापना।
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यदि आप पूरे मूल प्राकृत/संस्कृत सुतरों के साथ पूरा क्रम (जैसे – नवकार, लोगस्स का पूरा पाठ, अवस्थाचिंतन के असली शब्द आदि) चाहें, तो अपने सम्प्रदाय / गच्छ का नाम लिखें; उसी के अनुसार पारम्परिक पाठ के साथ सरल अर्थ दे सकता हूँ।