OM RIM SHREE AHRAM SRI GAUTAM SWAMY NAMAH YEH JAP BARABAR HAI
ये मंत्र के शब्द इस प्रकार लिखे हैं:
“ॐ रीं श्री अंहं श्री गौतम स्वामी नमः” (आपने “AHRAM” लिखा है, वह सम्भवतः “अंहं” / “अहं” या “अरहम/अरहं” जैसा कुछ बोलकर लिखा गया होगा)
जैन परंपरा में गौतम स्वामी के लिए जो प्रसिद्ध मंत्र / स्तुतियाँ हैं, वे सामान्यतः संस्कृत या प्राकृत में इस तरह होते हैं, जैसे –
- “वंदे गौतमगुरुं सदा, ज्ञानदर्शनविहारिणम्…”
- या “गौतमगणधरं वन्दे, ज्ञानदर्शनदायकम्…”
आपका लिखा हुआ “ॐ रीं श्री … गौतम स्वामी नमः”
- एक व्यक्तिगत/लोकभाषा वाला बीज‑मंत्र जैसा संयोजन है,
- जैन आगमों में ऐसा शुद्ध रूप से स्थापित / प्रमाणित मंत्र नहीं मिलता।
इसलिए:
- जप “गलत” नहीं कहा जाएगा – भगवान व उनके गणधर के प्रति श्रद्धा से लिया हुआ नाम व्यर्थ नहीं जाता।
- लेकिन अगर “शास्त्रीय रूप से सही” जैन मंत्र बोलना है, तो बेहतर है कि परंपरागत गौतम स्वामी स्तुति या श्लोक ही लें, जैसे:
संक्षिप्त, सरल श्लोक `गौतमगणधरं वन्दे, ज्ञानदर्शनदायकम्। सर्वसंकल्पसंक्लेशं, नाशयित्वा सुखावहम्॥`
अर्थ (सरल): मैं गौतम गणधर को वंदन करता हूँ, जो ज्ञान और सम्यक दर्शन प्रदान करते हैं, जो सब भ्रम और कष्टों का नाश कर सुख देने वाले हैं।
- “ॐ रीं…” वाला जप अगर आपने गुरु, परिवार या किसी साधु‑साध्वी से लिया है, और वे जैन धर्मानुसार ही भक्ति करा रहे हैं, तो आप उसे श्रद्धा से कर सकते हैं;
साथ‑साथ ऊपर वाला शास्त्रीय श्लोक भी सीख लें, ताकि आपका जप आगमिक परंपरा से भी जुड़ जाए।
श्वेताम्बर‑दिगम्बर दोनों परंपराओं में गौतम स्वामी का महिमान गान होता है; शब्दों में थोड़ा फर्क हो सकता है, पर भाव – ज्ञान, सम्यक दर्शन और विनय की प्राप्ति – यही रहता है।