Jain mandir pooja
मैं आपको बहुत सरल तरीके से “Jain mandir pooja ka basic tariqa” बता देता हूँ, जो ज़्यादातर जगह Digambar–Shwetambar दोनों में मिलती‑जुलती भावना से होता है।
---
1. Mandir में प्रवेश से पहले
- घर से या बाहर से आते समय
- मंदिर के गेट पर
---
2. प्रवेश के बाद – सबसे पहले क्या करें?
- मुख्य वेदी की ओर जाएँ (जहाँ जिनबिंब / भगवान की मूर्ति है)
- दूर से ही दोनों हाथ जोड़कर, सिर थोड़ा झुकाकर
- धीमे से “णमोकार मंत्र” या “णमो अरिहंताणं…” बोलें
- अगर व्यवस्था हो तो
- प्रदक्षिणा (भगवान के चारों ओर दायीं ओर से शांत गति से घूमना) 1, 3 या 7 बार - बीच‑बीच में मन ही मन गुणों का स्मरण करना: “आयुष्मान, वीर्यवान, ज्ञानवान नहीं, बल्कि कषाय रहित, सर्वज्ञ, निरमोह…”
---
3. Dravya Pooja (सामग्री से पूजा) – Ashta‑prakari Pooja का सरल रूप
(ये ज़्यादातर मूर्ति‑पूजक Shwetambar और Digambar दोनों में किसी न किसी रूप में होती है। क्रम और मंत्र थोड़े बदल सकते हैं, पर भाव एक जैसा रहता है।)
8 प्रकार की पूजा (Ashta‑prakari):
- जल – अभिषेक / स्नान
- चन्दन – शीतलता, पवित्रता
- पुष्प – सुगंध, सुंदर भाव
- धूप – कषायों का दहन, सुगंधित वायु
- दीप – ज्ञान का प्रकाश
- अक्षत (चावल) – स्थिरता, निश्चय भाव
- नैवेद्य – संयम, सीमित भोग
- फल – कर्मफल, शुभ परिणाम
सामान्य विधि (बहुत सरल रूप)
> ध्यान रहे: जहाँ मन्दिर की मर्यादा जो हो, उसी के अनुसार ही करें। कुछ मंदिरों में केवल पंडित या नियुक्त व्यक्ति ही अभिषेक करते हैं।
- जल अभिषेक
- भगवान पर हल्का जल चढ़ाएँ (अगर अनुमति हो) - मन में: “हे जिनेन्द्र! आप सर्वकषाय रहित हैं, मैं अपने राग‑द्वेष धोने की भावना कर रहा/रही हूँ।”
- चन्दन
- थोड़ा चन्दन लगाएँ (केवल अधिकृत स्थान पर) - भावना: “मेरे मन को भी इतना ही शीतल बना दीजिए – बिना क्रोध, बिना अहंकार।”
- पुष्प / माला
- पुष्प चढ़ाएँ - भावना: “जैसा फूल कोमल है, वैसा ही कोमल हृदय सब जीवों के प्रति बने।”
- धूप
- धूप दिखाएँ या चढ़ाएँ (जहाँ जैसा नियम हो) - भावना: “मेरी कषायें (क्रोध, मान, माया, लोभ) धुएँ की तरह नष्ट हों।”
- दीपक
- दीप जलाकर भगवान के सामने रखें - भावना: “जैसे यह दीप अन्धकार दूर कर रहा है, वैसे ही सम्यक ज्ञान मेरे भीतर अज्ञान दूर करे।”
- अक्षत
- थोड़े चावल अर्पित करें - भावना: “मैं धर्म में स्थिर रहूँ, डगमग न होऊँ।”
- नैवेद्य
- थोड़े मेवे / मिठाई / शक्कर आदि रखें - भावना: “मैं भोग‑विलास में न फँसू, संयम से जीवन जिऊँ।”
- फल
- कोई फल चढ़ाएँ - भावना: “सुख‑दुःख सब मेरे पूर्व कर्मों का फल हैं, मैं सहनशील बनूँ और नए पाप कर्म न बाँधूँ।”
---
4. Bhav Pooja (बिना सामग्री, केवल भाव और मंत्र)
यदि आप dravya‑pooja न करना चाहें या समय कम हो, तो केवल भाव‑पूजा भी कर सकते हैं:
- शांत बैठकर 5–10 मिनट Navkar Mantra का जाप
- कोई छोटा‑सा स्तोत्र / चल्लीसा / पूजन के पद (जैसे “जिनचैत्यवंदन”, “लग्हु शांति पाठ” – जहाँ जो परंपरा हो)
- 2–3 मिनट चुप बैठकर भगवान के गुणों का ध्यान
- अंत में “परनindak, क्रोध, कटु वाणी से बचने” की अंदर ही अंदर प्रतिज्ञा
---
5. Aarti / Mangal / Chaitya‑Vandan
- कुछ मंदिरों में सुबह‑शाम आरती होती है
- समय पर उपस्थित हों, साथ में
- Digambar मंदिरों में बहुधा आरती से ज्यादा शांत स्तुति, स्वाध्याय होता है;
---
6. मंदिर की मुख्य मर्यादा (दोनों परंपराओं में समान भावना)
- अंदर ज़ोर‑ज़ोर से बात न करें, फोन साइलेंट रखें
- बच्चों को भी धीरे बोलने के लिए समझाएँ
- जिनबिंब, वेदी, ग्रन्थ – किसी भी चीज़ को असम्मान से न छुएँ
- माँस, शराब, तम्बाकू आदि के नशे में या सेवन के बाद मंदिर न जाएँ
- स्त्रियाँ मासिक धर्म के समय अधिकांश परंपराओं में
इस विषय पर जैन नॉलेज पर सुन्दर लेख भी है – “Why to do pooja”
---
सार
- Jain mandir की असली पूजा = शांत मन + विनम्रता + भगवान के गुणों का स्मरण
- Dravya (जल, चन्दन, पुष्प…) केवल सहारा हैं, असली पूजा भाव की है
- Digambar हो या Shwetambar – बाहरी रीति थोड़ा बदले, पर लक्ष्य एक ही है: