सामायिक की क्षेत्र सीमा कितनी?
जैन धर्म के अनुसार, सामायिक करते समय क्षेत्र की सीमा निर्धारित की जाती है ताकि सामायिक के दौरान साधक का मन और शरीर एक सीमित क्षेत्र में ही स्थिर रहे और उसकी एकचित्तता बनी रहे। यह सीमा "सामायिक क्षेत्र" (Samayik Kshetra) कहलाती है।
सामायिक की क्षेत्र सीमा के बारे में शास्त्रों में बताया गया है कि—
- मूल रूप से, सामायिक की सीमा उतनी मानी जाती है, जितनी दूरी साधक बिना बाहरी सहारे के (जैसे छड़ी या किसी के सहारे) सहजता से घूम-फिर सके।
- दिगंबर परंपरा में, इसे "त्रिक" (त्रिकोण/त्रिसीमा) कहा जाता है, जो लगभग 4 हाथ (लगभग 6 से 8 फीट) की सीमा होती है।
- श्वेतांबर परंपरा में, सामायिक की सीमा "एकासन" (एक ही आसन या स्थान) या अधिकतम 10 हाथ (लगभग 15 फीट) तक मानी जाती है।
सारांश: सामायिक के दौरान साधक को उसी सीमित क्षेत्र (लगभग 4 से 10 हाथ या अपने आस-पास का छोटा क्षेत्र) में रहना चाहिए और उसी में चलना-फिरना, बैठना, उठना आदि करना चाहिए। इससे साधक बाह्य गतिविधियों से बचकर आत्म-चिंतन में लीन रह सकता है।