स्थानक एवं मन्दिर
जैन धर्म में “स्थानक” और “मंदिर” – दोनों ही पूजा‑उपासना के केंद्र हैं, पर दोनों की परम्परा और शैली अलग है।
1. स्थानक (स्थानकवासी परम्परा)
- यहाँ generally मूर्ति‑पूजा नहीं होती, केवल उपासना, प्रतिक्रमण, प्रार्थना, प्रवचन, स्वाध्याय आदि होते हैं।
- जिनेन्द्र भगवान को आरण्यक या निर्ग्रन्थ रूप से (निर्मूर्ति‑भाव से) स्मरण किया जाता है।
- सादगी अधिक रहती है – न शिखर, न घंटा‑घड़ियाल, न आरती‑धूप की परम्परा (कुछ स्थनों पर नामजप, स्तुति आदि होते हैं)।
- ज़ोर रहता है:
2. मंदिर (मूर्ति‑पूजक – दिगम्बर / श्वेताम्बर दोनों)
- यहाँ तीर्थंकरों की मूर्तियाँ (प्रतिमा / जिनालय) स्थापित होती हैं।
- पूजा, अभिषेक, शृंगार, आरती, पाठ, स्तव‑स्तोत्र आदि द्वारा जिनेन्द्र भगवान की प्रतिमा की वंदना की जाती है।
- मान्यता:
- मंदिर में:
3. दोनों का मूल लक्ष्य
- आत्मा की शुद्धि, कर्म‑निर्जरा और मोक्ष‑मार्ग पर चलना – यही दोनों परम्पराओं का लक्ष्य है।
- अंतर केवल रीति‑रिवाज और साधना‑शैली का है:
4. दिगम्बर / श्वेताम्बर पार्श्व
- दिगम्बर और श्वेताम्बर – दोनों में मुख्य धारा मूर्ति‑पूजक रही है (मंदिर परम्परा)।
- स्थानक परम्परा मुख्यतः श्वेताम्बर समुदाय के एक भाग में विकसित हुई (स्थानकवासी, तेरापंथ आदि)।
निष्कर्ष: जैन दर्शन की दृष्टि से – चाहे स्थानक हो या मंदिर – साधक का उद्देश्य और अंतरंग भाव शुद्ध हो, वही प्रमुख है; बाह्य स्थान या रूप केवल साधन‑मात्र हैं।