Jai viyray sutra
Here is the Jai Viyaray (Jaya Viyaraya) Sutra with simple meaning:
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मूल पाठ (Prakrit / Hindi)
- जय वीयराय! जग-गुरु!
होउ ममं तुह प्पभावओ भयवं! भव-निव्वेओ मग्गाणुसारिआ इट्ठफल-सिद्धी।
- लोग-विरुद्ध-च्चाओ, गुरु-जण-पूआ, परत्थ-करणं च,
सुह-गुरु-जोगो तव्वयण-सेवणा आ-भवमखंडा।
- वारिज्जइ जइ वि नियाण-बंधणं वीयराय! तुह समये,
तह वि मम हुज्ज सेवा, भवे भवे तुम्ह चलणाणं।
- दुक्ख-क्खओ कम्म-क्खओ,
समाहि-मरणं च बोहि-लाभो अ, संपज्जउ मह एअं, तुह नाह! पणाम-करणेणं।
- सर्व-मंगल-मांगल्यं, सर्व-कल्याण-कारणम्,
प्रधानं सर्व-धर्माणां, जैनं जयतु शासनम्॥
(पाठ में छोटे-छोटे भेद जगह-जगह मिलते हैं, पर भाव एक ही रहता है।)
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अर्थ (सरल भाषा में)
- “जय वीयराय! जग के गुरु!”
– हे वीर प्रभु (भगवान महावीर), जगत के गुरु! आपकी कृपा से मुझे जन्म–मरण के चक्र से विरक्ति (उब) हो, सम्यक मार्ग का अनुसरण कर शुभ और परम फल (मोक्ष) की सिद्धि मिले।
- – संसार में जो भी गलत, पापमय या अशुभ है, उसे मैं छोड़ दूँ।
– गुरुजनों और साधु–साध्वियों के प्रति मेरे मन में सच्ची श्रद्धा रहे। – मैं दूसरों का हित करने वाला बनूँ। – मुझे सच्चे सद्गुरु का संग मिले और – उनकी आज्ञा व उपदेश का इस पूरे संसार–चक्र में अखण्ड पालन करूँ।
- – हे वीत्राग प्रभु! आपके सिद्धांत में
जीनों से सांसारिक वरदान माँगना उचित नहीं है, फिर भी मेरी एक ही प्रार्थना है कि हर जन्म में मुझे आपके चरणों की भक्ति–सेवा करने का अवसर अवश्य मिले।
- – आपके चरणों में किए हुए इस प्रणाम से
मेरे चार वर पूरे हों: (1) सब दुःखों का नाश, (2) सब कर्मों का क्षय, (3) सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान, सम्यक चरित्र की प्राप्ति, (4) और अंत में शांति–पूर्वक समाधि–मरण की सिद्धि।
- – जो सभी मंगलों में सबसे श्रेष्ठ है,
जो सभी कल्याणों का कारण है, जो सभी धर्मों में प्रधान है – ऐसा जैन शासन सदा विजयी रहे।
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परम्परा सम्बन्धी बात
- यह आगमिक (कैननिकल) सूत्र नहीं, बल्कि एक भक्तिमय प्रार्थना–सूत्र / स्तोत्र है।
- श्वेताम्बर और दिगम्बर – दोनों परम्पराओं में