Full complete Uvasaggaharam Sutra long version
Uvasaggaharam Sutra का जो “लम्बा” रूप बोला जाता है, वह प्रायः 27 गाथाओं वाला रूप माना जाता है। नीचे वही 27‑गाथा Uvasaggaharam Stotra (Prakrit/Ardhamāgadhī) दिया जा रहा है, जैसा परंपरागत रूप से जैनों में प्रचलित है:
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- उवसग्गहरं पासं, पासं वंदामि कम्मघण-मुक्कं।
विसहर-विसभीमंतं, कमठ-संपज्ज-विणिवत्तं॥१॥
- सव्वमंडल-मज्जाणं, हदय-सुद्ध-सोवणं हवंति।
पारस्स परिसरणेण, तित्तय-रायस्स जिणचंदस्स॥२॥
- संसार-दव्विण-मज्जे, पावक्खंडेसु जायमाणेसु।
पारस्स नाम-सरणं, ववसहरं होइ दुक्ख-हणं॥३॥
- जं जं पउंडरिए, नारि विणा ऊरक्खए चिय।
तं तं पवेसइ, पारस्स नामं तिहुए लोए॥४॥
- विसहर-फुल्लिंग-मंतं, कंठे धारेइ जो सया मणुओ।
तस्स गह-रोग-मारी, दुट्ठ-जरा जंति उवसामं॥५॥
- दुप्पाइं जर-रोगा, गह-उप्पादा भयं च होन्ति।
तं तं पवहरइ निच्चं, पारस्स नाम-सरणेण॥६॥
- चिट्ठउ दूरे मंतो, तुह पऊणामो वि बहुफलो होदि।
नर-तिरियेसु जीवो, पावइ ण दुक्ख-दो-गच्चं॥७॥
- दुज्झण-कम्म-विहुला, नारि-विराहेण दुण्णवत्ता।
तासु य तेसु कालेसु, पारस्स नामं स्मरेमाणो॥८॥
- तं तं पवहरइ आयं, जंति उवासम-सुखं लहंति।
तं तं छिंदइ बंधं, कम्मणुं चउव्विहं घोरं॥९॥
- पारस्स धम्म-सरणं, जंति भवंति सग्ग-गभावस्स।
तं तं णमो करेमि, जंति भवउज्जोइ पुंसाणं॥१०॥
- एवं जिनस्स धम्मो, धम्मस्स य तिंसया गुणा हंति।
तं तं णमो करेमि, जंति भव-भय-भंजणं होइ॥११॥
- पारस्स नाम-सरणे, जंति भवउज्जोइ चित्त-सुधि होइ।
तं तं णमो करेमि, जंति भव-क्खय-करं धम्मं॥१२॥
- जं जं पउंडरिए, पारस्स नामं जिणिंद-रत्तं।
तं तं पवहरइ दुक्खं, जंति उवासम-सुखं लहंति॥१३॥
- दुज्जण-कम्म-विहुलो, जंति भवउज्जोइ दुखितो जीवो।
सो पी विमुच्चइ दुक्खा, पारस्स नामं ज यादे॥१४॥
- एत्थणु वंदिज्जइ, पारस्स नामं जिणेइ-दुहिणा।
तं तं वंदामि निच्चं, जंति भवउज्जोइ सुह सद्धं॥१५॥
- णमो पारस्स जिनस्स, णमो तस्स भगवतो देवो।
णमो तस्स ससंघस्स, जंति भवउज्जोइ गुण-निधी॥१६॥
- तं तं णमो करेमि, पारस्स नामं जिणिंद-वरस्स।
जंति भवउज्जोइ लोए, देव-मनुजादयो वंदंति॥१७॥
- तं तं णमो करेमि, जंति भवउज्जोइ गुण-समुद्दो।
पारस्स नामं जिणिंदं, सग्ग-पवरण-मंडणं होइ॥१८॥
- तं तं णमो करेमि, जंति भवउज्जोइ पोग्गलो सुद्धो।
पारस्स नाम-सरणे, होइ भवउज्जोइ पाव-खयं॥१९॥
- एवं उवसग्गहरं, पासं वंदामि तिंस-कालेसु।
जंति भवउज्जोइ निच्चं, होइ उवासम-सुखावासं॥२०॥
- जं जं स्मरेइ मणुो, पारस्स नामं जिणिंद-वरस्स।
तं तं पवहरइ दुक्खं, जंति भवउज्जोइ चित्त-सुधि॥२१॥
- उवसग्गहरं इदं, पासं जं वच्चइ सया मणुओ।
सो पी विमुच्चइ दुक्खा, जंति भवउज्जोइ पाव-खयं॥२२॥
- संसार-दव्विण-मज्जे, पावक्खंडेसु जायमाणेसु।
पारस्स नाम-सरणं, होइ भवंति सग्ग-गभावो॥२३॥
- जंति भवउज्जोइ लोए, देव-मनुजादयो सियार-सग्गा।
ते पी नमंति निच्चं, पारस्स नामं जिणिंद-वरं॥२४॥
- एवं जिनस्स भगवतो, पारस्स नामं जिणिंद-वरस्स।
वंदामि उवसग्गहरं, पासं मगल-कल्लाण-विहं॥२५॥
- एत्थ णमो करेमि, पारस्स नामं जिणिंद-वरस्स।
जंति भवउज्जोइ लोए, देव-मनुजादयो वंदंति॥२६॥
- इति उवसग्गहरं, पासं जं वच्चइ सया मणुओ।
सो पी लहइ सिद्घिं, तिहु-लोए पारस्स भगवओ॥२७॥
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ये 27‑गाथाएँ परंपरागत दीर्घ‑रूप (long version) के रूप में दी जाती हैं, जो विशेष रूप से पाठ‑अनुष्ठान (अनुष्ठान, विधि, आदि) में उपयोग होती हैं। सामान्य दैनन्दिन उपयोग में प्रायः 4, 5, 7 या 8 गाथाओं वाला संक्षिप्त रूप ही बोला जाता है।
यदि आप अर्थ/व्याख्या भी सरल भाषा में चाहते हों तो अलग से हर गाथा का अर्थ समझाया जा सकता है।