Do you have knowledge of 4 dadagurus ?
Yes.
When Jains say “चार दादागुरु” they usually mean the four great Acharyas of the Śvetāmbara Khartar‑gacch tradition, who are specially worshipped in Rajasthan and Gujarat:
- पहले दादागुरु – आचार्य जिनदत्तसूरि (Jindattsuri / Jin Dutt Suri)
- दूसरे दादागुरु – आचार्य जिनचन्द्रसूरि प्रथम (Jinchandrasuri I)
- तीसरे दादागुरु – आचार्य जिनकुशलसूरि (Jinkushalsuri)
- चौथे दादागुरु – आचार्य जिनचन्द्रसूरि द्वितीय (Jinchandrasuri II)
– इन्हें ही “अकबर प्रतिबोधक दादागुरु” भी कहा जाता है, क्योंकि इन्होंने बादशाह अकबर को जैन धर्म का उपदेश दिया।
संक्षेप में:
- ये सभी महान श्रुत‑केवली जैसे विद्वान, संयमी और त्यागी आचार्य माने जाते हैं।
- इनकी स्मृति में जो स्थान बने हैं, उन्हें “दादावाड़ी” कहा जाता है।
- भक्त लोग वहाँ जाकर प्रार्थना, पाठ, स्वाध्याय और तप करते हैं और मानते हैं कि इनकी कृपा से सम्यक दर्शन–ज्ञान–चारित्र की प्रगति होती है।
- यह परंपरा मुख्यत: श्वेतांबर खर्तारगच्छ में पायी जाती है; दिगंबर परंपरा में “चार दादागुरु” ऐसा विशेष समूह प्रचलित नहीं है, वहाँ अपने-अपने आचार्य, गुरुवर, सिद्ध और तीर्थंकरों की भक्ति प्रमुख है।
अगर आप चाहें तो मैं अगली बार किसी एक दादागुरु का जीवन, प्रमुख घटनाएँ और उनसे मिलने वाली आध्यात्मिक सीख भी बहुत सरल भाषा में बता सकता हूँ।