Sagari santhara slok
“Sagari Santhara” कोई मशहूर श्लोक / स्तोत्र का नाम नहीं है, बल्कि Santhara (Sallekhana) की एक प्रकार (टाइप) है।
1. Santhara / Sallekhana क्या है?
- जीवन के बिल्कुल अंतिम चरण में
- जब रोग, अत्यंत बुढ़ापा या कोई ऐसी परिस्थिति हो कि धार्मिक जीवन चलाना सम्भव न रहे,
- तब शांति, समता और पूर्ण वैराग्य के साथ
- यह आत्म‑शुद्धि, राग‑द्वेष का क्षय और कर्म निर्जरा के लिए किया जाने वाला व्रत है, इसे आत्महत्या नहीं माना जाता।
2. Sagari Santhara क्या होता है?
परम्परागत रूप से Santhara दो प्रकार से वर्णित किया जाता है:- यावत्कालिक Santhara
- जब यह निश्चय पूरे शेष जीवन के लिए होता है - यानी एक बार व्रत लिया, अब सामान्य आहार पर वापस नहीं आते।
- Sagari Santhara
- जब कोई निश्चित, गंभीर परिस्थिति सामने हो (जैसे: अत्यन्त कष्टकारी असाध्य रोग, भारी अकाल आदि) - और यह निश्चय किया जाए कि “यदि यह आपत्ति नहीं टली और मृत्यु निश्चित है, तो मैं Santhara द्वारा ही देह छोड़ूँगा।” - यदि अप्रत्याशित रूप से परिस्थिति सुधर जाए और मृत्यु निश्चित न रहे, तो व्रत रोका भी जा सकता है, और फिर साधक सामान्य धार्मिक जीवन में लौट सकता है। - इस प्रकार की स्थिति‑आधारित, समय‑बद्ध संथारा को Sagari Santhara कहा जाता है।
3. “Sagari Santhara श्लोक” के बारे में
- पारम्परिक Digambar या Shwetambar आगम‑ग्रंथों में
- कई क्षेत्रों में Santhara का संकल्प लेते समय
- ऐसे स्थानीय पाठ संगठन या गुरु‑परम्परा विशेष के होते हैं, इसलिए वे हर जगह एक जैसे नहीं होते।
यदि आपको Santhara / Sallekhana के बारे में और विस्तार से, बहुत सरल भाषा में पढ़ना हो तो आप यह विवरण देख सकते हैं: You can read more here