चैतन्यवस्तु शुभा शुभ भावों में भ्रमण कर रही, भाव भ्रमण ही भव भ्रमण भाव अंदर से बंद बाहर से भव - भ्रमण उभय भ्रमण की परिसमाप्ति चैतन्य वस्तु परमात्मा की प्राप्ति ! प्राणी अनादि – अविद्या के वश स्व – पर भेद विज्ञान भूल गया, चैतन्य वस्तु के बोध बिना अचैतन्
आपने जो पंक्तियाँ लिखी हैं, वह मूलतः “चैतन्य (आत्मा) और अचैतन्य (पुद्गल, शरीर आदि)” के सही बोध की बात करती हैं। इसे बहुत सरल भाषा में समझें:
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1. “चैतन्य वस्तु शुभ–अशुभ भावों में भ्रमण कर रही…”
- चैतन्य वस्तु = आत्मा (जीव)
- आत्मा अपने शुभ (सात्त्विक, पुण्य वाले) और अशुभ (कषाय, पाप वाले) भावों में ही घूम रही है।
- इन्हीं भावों का भ्रमण (भाव-भ्रमण) आगे चलकर जन्म–मरण का चक्कर (भव-भ्रमण) बन जाता है।
- जब भीतर के भावों का विचलन (भाव-भ्रमण) रुक जाता है, तभी बाहर का जन्म–मरण का चक्कर (भव-भ्रमण) भी रुकता है।
- दोनों प्रकार के भ्रमण (उभय-भ्रमण) की समाप्ति = चैतन्य वस्तु (आत्मा) की सिद्ध अवस्था, परमात्मा पद की प्राप्ति।
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2. “प्राणी अनादि-अविद्या के वश स्व–पर भेद विज्ञान भूल गया…”
- अनादि काल से जीव अविद्या (अज्ञान) के अधीन है।
- वह “मैं कौन हूँ?” (स्व) और “जो मैं नहीं हूँ” (पर – शरीर, मन, इंद्रियाँ, पदार्थ) – इन दोनों का सही भेद भूल गया है।
- जैन दर्शन में इसे ही जीव–अजीव का अभेद मान लेना कहा जाता है – यही संसार का मूल कारण है।
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3. “चैतन्य वस्तु के बोध बिना अचैतन्य का बोध नहीं…”
- वास्तव में चेतन (आत्मा) ही सबको जानने वाला (ज्ञाता) है।
- अचैतन्य (शरीर, रसायन, पुद्गल, वस्तुएँ) स्वयं को या किसी को नहीं जानते, उन्हें जानने वाला आत्मा ही है।
- इसलिए:
- जब दोनों (चेतन और अचेतन) को सही रूप से जाना जाता है, तब विवेक पैदा होता है –
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4. “उपादेयता किसकी – चैतन्य की या अचैतन्य की?”
जैन दर्शन का स्पष्ट सिद्धान्त:
- उपादेय (जिसे अपनाना है) – सिर्फ चैतन्य (आत्मा)
- अचैतन्य (शरीर, मन, पदार्थ, पुद्गल) –
लेकिन:
> “अचैतन्य के अभाव में चैतन्य का बोध नहीं”
इसका भावार्थ:
- जब तक जीव देह, मन, इंद्रियों आदि के साथ व्यवहार जगत में है,
- अतः व्यवहार से अचैतन्य भी “उपयोगी” साधन जैसा लगता है,
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5. “चैतन्य, चैतन्य होता अविनाभावी अचैतन्य में चैतन्य का अचैतन्य, अचैतन्य का चैतन्य भाव!”
यहाँ संकेत है:
- आत्मा (चैतन्य) का स्वभाव अलग है,
- परन्तु संसारावस्था में
- जैसे:
- वास्तविकता:
- जब सम्यक् ज्ञान से यह भेद खुल जाता है –
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सार
- जीव (चैतन्य) शुभ–अशुभ भावों में उलझकर अनंत जन्म–मरण में घूम रहा है।
- अनादि अज्ञान के कारण उसने आत्मा और अनात्म (स्व–पर) का भेद खो दिया है।
- सही साधना यह है:
- चैतन्य (आत्मा) और अचैतन्य (शरीर आदि) दोनों का सही ज्ञान हो, - पर उपादेयता केवल आत्मा की मानी जाए।
- अचैतन्य साधन मात्र है, लक्ष्य नहीं;
लक्ष्य है – शुद्ध चैतन्य स्वभाव में स्थित होना = परमात्मा पद।
इसी को जैन दार्शनिक भाषा में जीव–अजीव का भेदबोध, सम्यग्दर्शन, सम्यक्ज्ञान और अंततः मोक्षमार्ग कहा गया है।