PETHADHA MANTRI KI GIRNAR KI KHANI
पેથડ (पेताढ़) मंत्री और गिरनार की कहानी – सरल रूप में
यह कथा जैन श्रावक महा–दानवीर पेताढ़ शाह मন্ত্রী की है, जिन्होंने अपनी श्रद्धा और त्याग से श्री गिरनार तीर्थ को श्वेताम्बर जैन समाज के लिए स्थिर किया।
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1. पेताढ़ शाह कौन थे?
- मंडवगढ़ के प्रसिद्ध जैन श्रावक और मন্ত্রী
- बहुत बड़े दानी, धर्म–प्रेमी, तपस्वी और तीर्थ-भक्त
- अनेक जिनालय, उपाश्रय, ज्ञानभण्डार आदि बनवाने वाले महान श्रावक
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2. गिरनार की यात्रा
एक बार पेताढ़ मন্ত্রী बहुत बड़ा जैन संघ लेकर श्री गिरनार जी की यात्रा पर निकले। उसी समय एक दूसरा बड़ा संघ भी वहाँ आया –
- उस संघ के मुख्य सेठ का नाम पूर्णा (या पूर्ण सेठ) बताया जाता है
- वे दिगम्बर परम्परा के अनुयायी थे
दोनों संघों ने एक ही समय गिरनार पर्वत पर चढ़ने की तैयारी की।
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3. “पहले कौन चढ़े?” – विवाद की शुरुआत
जब चढ़ाई शुरू हुई तो पूर्णा सेठ के लोगों ने कहा – > “पहले हमारा (दिगम्बर) संघ ऊपर जाएगा, > श्वेताम्बर बाद में जाएँ।”
पेताढ़ मन्त्री के संघ ने उत्तर दिया – > “गिरनार किसी एक पंथ की जागीर नहीं है, > यह तो सभी जैनों का पवित्र सिद्ध-क्षेत्र है, > सबको एक साथ ऊपर जाने का अधिकार है।”
थोड़ी कहा–सुनी बढ़ी, माहौल तनावपूर्ण हो गया। तभी दोनों पक्षों के कुछ बुजुर्ग और समझदार लोग बीच में आए और कहा –
- “हम झगड़ा छोड़ते हैं,
- दोनों संघ साथ–साथ ऊपर चलें,
- और भगवान नेमिनाथ के दरबार में निर्णय होगा कि
निर्णय की एक विशेष शर्त रखी गई:
> “जो पक्ष भगवान के सामने > सबसे अधिक धन (सोना) समर्पित करेगा, > उसे ही गिरनार तीर्थ का ‘अधिकार’ माना जाएगा।”
दोनों पक्ष इस पर राजी हो गए।
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4. भगवान नेमिनाथ के समक्ष बोली
दोनों संघ मिलकर ऊपर चढ़े, भगवान नेमिनाथ के चरणों में प्रणाम किया, पूजा–आरती, ध्वज, स्तुति सब की गई।
अब बारी आई – “स्वर्ण–समर्पण” की।
दोनों पक्ष सोने की बोली लगाने लगे:
- पहले सोने के सिक्के
- फिर सोने की डलियाँ
- फिर “घड़ी / घड़ी” (सोने की माप) के हिसाब से बोली
बोली इस प्रकार बढ़ती गई:
- पेताढ़ मंत्री – ५ घड़ी सोना
- पूर्णा सेठ – ६ घड़ी
- पेताढ़ मंत्री – ७ घड़ी
- …
- अंत में पेताढ़ मंत्री ने १६ घड़ी सोने तक बोली बढ़ा दी
पूर्णा सेठ को लगा कि अब वे हार जाएँगे, उन्होंने ८ दिन की मोहलत माँगी, ताकि अपने संघ से और सोना इकट्ठा कर सकें।
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5. दोनों पक्षों की तैयारी
पूर्णा सेठ की ओर से
- पूरे दिगंबर संघ से गहने, सिक्के, आभूषण सब इकट्ठा किए
- इतना सोना इकट्ठा हुआ कि २८ घड़ी तक पहुँच गया
- उन्हें लगा – “अब तो जीत हमारी ही होगी।”
पेताढ़ मंत्री की ओर से
- पेताढ़ ने तुरंत एक तेज ऊँटनी (ऊँट) को
- वहाँ से बहुत सारा सोना गिरनार पर मँगवाया
- वे निश्चय कर चुके थे –
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6. अंतिम बोली – ५६ घड़ी सोना
समय पूरा हुआ, अब अंतिम बोली का दिन आया।
पूर्णा सेठ ने गर्व से घोषणा की: > “हम २८ घड़ी सोना चढ़ाते हैं।”
सबकी नज़र अब पेताढ़ मंत्री पर थी। पेताढ़ मंत्री ने सिंह–गर्जना की तरह कहा:
> “मैं ५६ घड़ी सोना > भगवान के चरणों में अर्पित करता हूँ।”
सभा स्तब्ध रह गई। पूर्णा सेठ ने अपने संघ से और सोना माँगा, पर सबने कहा – > “अब हम और नहीं दे पाएँगे। > अपने घर जला कर मंदिर बनाना ठीक नहीं।”
इस तरह पूर्णा सेठ हार मान गए और बोले – > “अब आप ही विजय–माला धारण कीजिए।”
भगवान के दरबार में पेताढ़ मন্ত্রী के गले में इन्द्रमाला / विजय–माला पड़ी, और श्री गिरनार तीर्थ का अधिकार श्वेताम्बर समाज की ओर से पेताढ़ मंत्री को मिला।
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7. पेताढ़ मंत्री की प्रतिज्ञा और उपवास
माला तो मिल गई, पर पेताढ़ मंत्री के मन में विचार आया – > “मैंने ५६ घड़ी सोने की बोली भगवान के सामने लगाई है, > जब तक वास्तव में पूरा ५६ घड़ी सोना > भगवान के चरणों में न चढ़ा दूँ, > मैं जल तक ग्रहण नहीं करूँगा।”
उन्होंने व्रत किया –
- जब तक पूरा सोना न आ जाए,
ऊँटनी को मांडवगढ़ से सोना लाकर पहुँचने में समय लगना था, इस बीच
- एक दिन
- फिर दूसरा दिन
- वे निर्जल उपवास पर रहे।
जैसे–तैसे द्वितीय दिन सूर्यास्त से थोड़ी देर पहले ऊँटनी सोना लेकर पहुँची, पूरा ५६ घड़ी सोना तौलकर भगवान के चरणों में समर्पित किया गया।
अगले दिन पूरे चारों संघ (साधु–साध्वी–श्रावक–श्राविका) के बीच बड़े उत्साह से पेताढ़ मंत्री ने अपना दो दिन का निर्जल उपवास पारणा किया।
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8. इस कथा से क्या सीख मिलती है?
पेताढ़ मंत्री की गिरनार–कथा हमें सिखाती है:
- तीर्थ–भक्ति
– सच्चे अर्थ में तीर्थ की सेवा और रक्षा के लिए धन, मान, शरीर–सब की आहुति देने की भावना।
- धर्म–केन्द्रित निर्णय
– झगड़ा, मार–काट, द्वेष छोड़कर भगवान के दरबार में शांतिपूर्ण समाधान ढूँढना।
- वचन–पालन
– बोली लगाना आसान है, पर उसे निभाने के लिए दो दिन तक निर्जल उपवास – यह अतुलनीय निष्ठा है।
- त्याग और अपरिग्रह की प्रेरणा
– इतना धन होते हुए भी पेताढ़ मंत्री उसे भगवान और धर्म के लिए न्योछावर कर देते हैं, अपने लिए नहीं जमा करते।
इसी कारण पेताढ़ शाह मंत्री को जैन इतिहास में अतुलनीय दानी, धर्म–भक्त और तीर्थ–रक्षक श्रावक के रूप में याद किया जाता है, और गिरनार की महिमा में उनका नाम विशेष श्रद्धा से लिया जाता है।
यदि आप गिरनार तीर्थ के बारे में संक्षेप और सरल बिंदुओं में पढ़ना चाहें, तो उसके मुख्य महत्व के बारे में एक अच्छी जानकारी यहाँ दी गई है: