PETHADSHA MANTRI KI GIRNAR KI KHANI
पेथड़शाह मन्त्री की गिरनार वाली कथा – सरल रूप में
पेथड़शाह (या पेथद शाह) श्रावक परमार राजा जयसिंहदेव (माण्डवगढ़ के राजा) के मुख्य मन्त्री थे। वे अत्यन्त दानी, धर्मपरायण और जिनेन्द्रभगवान के बड़े भक्त माने जाते हैं।
1. पेथड़शाह का भाव
- बचपन से ही जैन धर्म, पूजा‑स्वाध्याय, दान आदि में बहुत रुचि थी।
- जैसे‑जैसे वे सम्पन्न बने, वैसे‑वैसे उन्होंने धन को केवल धर्म, दान, उपाश्रय, मंदिर, यात्राओं आदि में लगाया।
- श्वेताम्बर परम्परा में प्रसिद्ध है कि उन्होंने सैकड़ों साधु‑साध्वियों के लिए उपाश्रय, धर्मशालाएँ, अन्नक्षेत्र आदि बनवाए।
2. गिरनार की यात्रा का संकल्प
एक बार पेथड़शाह ने विचार किया – “जीवन मिला है, धन मिला है, तो उसे सिद्धक्षेत्रों की सेवा और दर्शन में लगाना चाहिए।”उन्होंने
- श्री नेमिनाथ भगवान के सिद्धक्षेत्र गिरनार,
- शत्रुंजय,
- आबू आदि तीर्थों की विशाल यात्राओं का संकल्प किया।
गिरनार यात्रा के समय –
- उन्होंने बहुत बड़ा संघ (हजारों श्रावक‑श्राविकाएँ, साधु‑साध्वियाँ) साथ लिया।
- पूरे मार्ग में अन्न‑पानी, दवाइयों, विश्रामस्थल आदि की पूरी व्यवस्था अपने खर्च से करवाई।
- किसी को भी यात्रा में कमी न रहे – यह उनका विशेष ध्यान था।
3. गिरनार पर्वत पर भावपूर्ण दान
जैन ग्रन्थों में उल्लेख है कि पेथड़शाह ने गिरनार पर पहुँचकर –- नेमिनाथ भगवान के समक्ष अत्यन्त भाव से पूजा‑ध्यान किया,
- विशाल स्वर्ण‑दान, ध्वज‑पताका, मंदिर‑मरम्मत, जिनप्रतिमा‑अलंकरण आदि का महादान किया,
- इतना दान दिया कि उस समय के आचार्य‑गणों ने उनके लिए “इन्द्रमाला” (सम्मान‑माला) धारण कर उन्हें सम्मानित किया – जैसे देवता भी ऐसे दानवीर पर प्रसन्न हों।
इसी भाव‑दर्शन और सेवा के कारण, परम्परा में कहा जाता है कि
- गिरनार के जैन तीर्थ के उन्नयन (तीर्थोद्धार) में पेथड़शाह और उनके कुल का विशेष योगदान रहा,
- बाद में उनके पुत्र झांझण (झंझना) ने भी गिरनार पर मंदिर बनवाकर स्वर्ण‑ध्वज लगवाया और तीर्थ की शोभा बढ़ाई।
4. इस कथा का धर्म‑संदेश
पेथड़शाह मन्त्रि की गिरनार‑कथा से हमें मुख्य बातें सीखने को मिलती हैं –
- धन का सच्चा उपयोग
- धन स्वयं में न पुण्य है न पाप – उसका उपयोग जैसा, वैसा फल। - पेथड़शाह ने धन को – तीर्थ, उपाश्रय, अन्नदान, साधु‑साध्वी सेवा, धर्मशाला आदि में लगाया, इसलिए वे आज भी “महादानी” श्रावक के रूप में याद किए जाते हैं।
- तीर्थ और संघ‑यात्रा का महत्त्व
- उन्होंने अकेले नहीं, बड़े संघ के साथ गिरनार यात्रा की, ताकि अधिकाधिक लोग लाभ लें। - तीर्थ‑यात्रा का फल केवल अपना नहीं, दूसरों को भी धर्ममार्ग पर प्रेरित करना है।
- श्रद्धा + नियम = महान फल
- केवल पैसा या बाहरी आयोजन नहीं, बल्कि गहरी श्रद्धा, विनय, संयम और आचार्यों के निर्देश से किया गया कार्य ही सच्चा “तीर्थोद्धार” कहलाता है। - पेथड़शाह ने आचार्य‑परम्परा के निर्देशन में कार्य किया, इसलिए उनकी कीर्ति आज तक बनी हुई है।
- पद और यश होते हुए भी विनम्रता
- वे राज्य के महा‑मन्त्री थे, परन्तु साधु‑साध्वी, श्रावक‑श्राविकाओं के आगे हमेशा विनम्र रहे। - किसी भी महापुरुष की पहचान यही है कि ऊँचे पद पर होकर भी अहंकार न हो, सेवा‑भाव बना रहे।
संक्षेप में, “पेथड़शाह मन्त्री की गिरनार की कहानी” हमें सिखाती है कि – जिस जीवन और सम्पत्ति को हम सामान्य समझते हैं, यदि उसे जैन धर्म, तीर्थ, साधु‑साध्वी, और सधर्मियों की सेवा में लगा दें, तो वही जीवन सफल और धन पुण्य‑सागर बन जाता है।