Tell me about kharua community of jain
“Kharua” (अधिक सही रूप से “Kharaua / Kharaua Kharaua”) कोई अलग से सर्व‑भारत प्रसिद्ध जैन जाति नहीं है, बल्कि मुख्य रूप से एक जैन समुदाय / कुल का नाम है, जो प्रसिद्ध गोलालारे जैन समाज से जुड़ा माना जाता है।
संक्षेप में मुख्य बातें:
- कौन हैं खरुआ / खरौआ जैन?
- यह समुदाय प्राचीन गोलालारे जैन समाज की ही एक शाखा माना जाता है। ( en.wikipedia.org) - गोलालारे समाज का प्राचीन केंद्र भिंड–इटावा (चम्बल किनारा, भदावर क्षेत्र) माना जाता है। - समय के साथ भदावर क्षेत्र के बहुत‑से गोलालारे, स्थानीय रूप से “खरौआ” (Kharaua / Kharua) नाम से प्रसिद्ध हो गए।
- भौगोलिक क्षेत्र
- मुख्य रूप से उत्तर भारत के भदावर–चम्बल–बुन्देलखण्ड क्षेत्र में इनका बसाव मिलता है (आज का उत्तर प्रदेश–मध्य प्रदेश सीमा क्षेत्र, जैसे भिंड, इटावा आदि)। ( en.wikipedia.org)
- धार्मिक परम्परा
- गोलालारे–खरौआ समुदाय मुख्यतः दिगम्बर जैन परम्परा से सम्बंधित माना जाता है। - इनकी आस्था दिगम्बर जैन आगम, तीर्थंकरों, जिनालयों और दिगम्बर आचार्यों में रही है।
- विद्वत्ता और पंडित परम्परा
- गोलालारे/खरौआ समाज में कई कुल ऐसे हैं जो “पाण्डे / पांडे (Pandey / Pande)” उपाधि से जाने जाते हैं। - इन कुलों से परम्परागत रूप से जैन शास्त्रों के आचार्य, पंडित, पुरोहित, और विद्वान निकलते रहे हैं। ( en.wikipedia.org) - प्रसिद्ध बलात्कारा‑गण के भट्टारक (जैसे एटर, रूड़ा आदि पीठ) में कई भट्टारक इसी समुदाय से माने जाते हैं; यानी यह समुदाय मठ–पीठ, शास्त्र-अध्ययन और दीक्षा-परम्परा से बहुत जुड़ा रहा है। ( en.wikipedia.org)
- आज की स्थिति (सामान्य रूप से)
- आज भी जो परिवार स्वयं को खरुआ / खरौआ गोलालारे जैन कहते हैं, वे सामान्य दिगम्बर जैनों की तरह ही - मंदिर‑पूजा, स्वाध्याय, जप–स्मरण, - पर्युषण, अष्टान्हिका आदि पर्व, - व्रत–उपवास, नियम आदि का पालन करते हैं। - सामाजिक रूप से इन्हें प्रायः जैन बनिया / जैन ब्राह्मणीय‑पंडित परम्परा से जुड़े विद्वान परिवारों के रूप में सम्मान मिला है (विशेषकर भदावर–बुन्देलखण्ड क्षेत्र में)।
- धर्म के दृष्टि से क्या विशेष?
- जैन धर्म की दृष्टि से कोई भी समुदाय, कुल या गोत्र केवल माध्यम है; मुक्ति तो - सम्यक दर्शन, - सम्यक ज्ञान, - सम्यक चरित्र से ही होती है – न कि किसी जाति या कुल से। - खरुआ / खरौआ जैन समुदाय की विशेषता यह रही कि इन्होंने - जैन आगमों का अध्ययन, - शास्त्र‑रचना और - भट्टारक परम्परा की सेवा में अच्छा योगदान दिया है; इससे जैन धर्म का ज्ञान और परम्परा सुरक्षित रही।
यदि आप किसी विशेष शहर या गाँव के “खरुआ जैन” के बारे में जानना चाहते हों (जैसे भिंड, इटावा आदि के), तो वहाँ की स्थानीय जैन समाज या मंदिर‑समिति से पूछने पर और भी परिवार‑स्तर की जानकारी मिल सकती है।