mohankheda tith ka ithas
मोहन्खेड़ा तीर्थ का इतिहास (संक्षेप में)
- स्थान व संप्रदाय
- मोहन्खेड़ा (जिला धार, मध्यप्रदेश) एक बहुत प्रसिद्ध श्वेताम्बर जैन तीर्थ है। - यह राजगढ़ गाँव के पास, इन्दौर–अहमदाबाद हाईवे पर स्थित है।
- स्थापना कब हुई?
- इस तीर्थ की स्थापना आचार्य प्रवर श्री विजय राजेन्द्रसूरिश्वरजी म.सा. ने की। - मूळनायक भगवान – श्री आदिनाथ (ऋषभदेव) भगवान, श्वेत संगमरमर की 107 से.मी. (लगभग साढ़े 3 फुट) पद्मासन प्रतिमा। - जैनज्ञान अनुसार यहाँ मन्दिर का प्रतिष्ठा–कार्य मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तमी, वीर निर्वाण संवत २४०९ (विक्रम संवत १९४०) में आचार्य राजेन्द्रसूरिश्वरजी के पावन हस्ते से हुआ।
- तीर्थ बनने की प्रेरणा
- आचार्य राजेन्द्रसूरिश्वरजी महाराज जब इस क्षेत्र में विहार कर रहे थे, तब उन्होंने यहाँ का शांत, प्राकृतिक, वन्य वातावरण देखकर यह दिव्य आश्वासन/भविष्यवाणी दी कि – “आगे चलकर यहाँ महान जैन तीर्थ बनेगा और जैन धर्म का बड़ा केन्द्र बनेगा।” - बाद में ठीक ऐसा ही हुआ – जंगल जैसा एक सुनसान क्षेत्र भव्य तीर्थ–नगर में बदल गया।
- समाधि स्थल
- यही स्थान आचार्य श्री राजेन्द्रसूरिश्वरजी म.सा., आचार्य श्री यतीन्द्रसूरिश्वरजी म.सा. तथा आचार्य श्री विद्यासागर/विद्याचन्द्रसूरि आदि महापुरुषों का समाधि–स्थल भी है। - दादागुरुदेव श्री राजेन्द्रसूरिश्वरजी की समाधि (समाधि मंदिर) अत्यन्त अलंकरणयुक्त व श्रद्धा का केन्द्र है।
- विशेषताएँ
- इस तीर्थ पर - आदिनाथ भगवान की मूळ प्रतिमा (पद्मासन), - अन्य जिनप्रतिमाएँ (जैसे श्री पार्श्वनाथ भगवान), - तथा दादागुरुदेव और अन्य आचार्यों के समाधि मन्दिर हैं। - मोहन्खेड़ा को प्रायः “मालवा का शत्रुञ्जय” भी कहा जाता है, क्योंकि यहाँ निरंतर तीर्थयात्रियों की भीड़ और धार्मिक कार्यक्रम होते रहते हैं।
- मुख्य पर्व व मेला
मोहन्खेड़ा में हर वर्ष बड़े स्तर पर धर्मसभा, पूजन व मेले होते हैं, विशेष रूप से – - कार्तिक पूर्णिमा, - चैत्र पूर्णिमा, - पौष शुक्ल सप्तमी (गुरु सप्तमी) – दादागुरुदेव से संबंधित प्रमुख दिन।
- आज का मोहन्खेड़ा
- अब यह तीर्थ केवल मंदिर ही नहीं, बल्कि - धर्म–प्रचार केन्द्र, - गुरुकुल व विद्यालय, - धर्मशाला, भोजनशाला, अस्पताल आदि सुविधाओं सहित एक पूरा तीर्थ–नगर बन चुका है। - ट्रस्ट द्वारा गुरुकुल, विद्यालय और अन्य सेवा–कार्यों का भी संचालन होता है।
संक्षेप में – मोहन्खेड़ा तीर्थ आचार्य श्री विजय राजेन्द्रसूरिश्वरजी म.सा. की दिव्य प्रेरणा से, मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तमी, वी.नं. २४०९ पर स्थापित हुआ, आज यह जैन धर्म का अत्यन्त प्रसिद्ध, शांत, चमत्कारिक व ज्ञान–केन्द्र के रूप में पूरे जैन समाज में आदर से देखा जाता है।