27 gatha uvasaggaharam sutra
Certainly! The Uvasaggaharam Stotra (sometimes spelled Uvasaggaharam Sutra) is a revered Jain prayer composed by Acharya Bhadrabahu, dedicated to the 23rd Tirthankara, Lord Parshvanath. It is recited by Jains for protection from obstacles, diseases, and negative influences.
The "27 gatha" refers to the 27 verses (gathas) of this stotra. Below is the Uvasaggaharam Stotra in Prakrit (Sanskritized Ardhamagadhi), as traditionally recited:
---
1. उवसग्गहरं पासं, पासं वंदामि कम्मघण-मुक्कं। विसहर-विसभीमंतं, कमठ-संपज्जवेणिविवत्तं॥
2. सव्वमंडल-मज्जाणं, हदयं सुद्ध-सोवणं हवंति। पारस्स परिसरणेण, तित्थय-रायस्स जिणचंदस्स॥
3. संसार-दव्विणमज्जे, पावक्खंडेसु जायमाणेसु। पावक्खंड-पहाणं, उवसग्गहरो करेइ॥
4. जो जिनगुण-संपं, धारेइ पडिहाणएण सयं। संपूज्जइ पास-नमिदं, तस्स भवइ सव्वसिद्धि॥
5. ओसरण-सुद्धि-भावं, जो जणओ हुंति तस्स। विहुणंति बंधणं तु, उवसग्गहरो करेइ॥
6. हत्त-परिखड-भयाणि, दाव-उलवाळ-संसयाणि च। मूड-उल-उलट्ठाणि, तुच्छंति जिणेहिं रक्खिताणि॥
7. पास-परिसरण-णित्तं, जो पवइ सुद्ध-भावेण। संपूज्जइ जिण-वरा, तस्स हुंति न किंचि दुव्वं॥
8. छिण्णंति कम्म-बंधं, तुच्छंति विहुणंति परिहरंति। पास-परिसरणेण, तित्थय-रायस्स जिणचंदस्स॥
9. संसार-सागर-मज्जे, जो नवंति जिण-चंद-सरणं। ते पावंति परम-सिद्धि, उवसग्गहरं धरेणा॥
10. संपूज्जइ जिण-वरं, जो पवइ सुद्ध-भावेण। पास-परिसरणेण, सव्वदुक्खं तुच्छंति॥
11. जो जिणेहि रक्खितो, भवइ सुद्ध-भावेण सयं। तस्स कम्म-विसरग्गो, तुच्छंति उवसग्ग-हरो॥
12. सव्वसिद्धि-पदं, हुंति सव्वदुक्खं तुच्छंति। पास-परिसरणेण, जिण-वरं वंदमाणस्स॥
13. पास-परिसरणं, जो धारेइ सुद्ध-भावेण सयं। तस्स सग्ग-मग्गं, पावइ सव्वसिद्धि-मुक्कं॥
14. जिणेहि सुद्ध-भावं, धारेइ पडिहाणएण सयं। पास-परिसरणेण, तुच्छंति विहुणंति परिहरंति॥
15. पास-परिसरणेण, जिण-चंदस्स पडिहाणएण सयं। सव्वसिद्धि-पदं, पावइ सव्वदुक्खं तुच्छंति॥
16. कमठ-विष-भयाणि, तुच्छंति विहुणंति परिहरंति। पास-परिसरणेण, तित्थय-रायस्स जिणचंदस्स॥
17. सव्वदुक्ख-पहाणं, हुंति सव्वसिद्धि-मुक्कं। पास-परिसरणेण, जिण-वरं वंदमाणस्स॥
18. विसहर-विसभी-मंतं, धारेइ पडिहाणएण सयं। तस्स सव्वदुक्खं, तुच्छंति उवसग्गहरो करेइ॥
19. संसार-सागर-मज्जे, जो नवंति जिण-चंद-सरणं। ते पावंति परम-सिद्धि, उवसग्गहरं धरेणा॥
20. पास-परिसरण-णित्तं, जो पवइ सुद्ध-भावेण। संपूज्जइ जिण-वरं, तस्स भवइ सव्वसिद्धि॥
21. सव्वसिद्धि-पदं, हुंति सव्वदुक्खं तुच्छंति। पास-परिसरणेण, जिण-वरं वंदमाणस्स॥
22. छिण्णंति कम्म-बंधं, तुच्छंति विहुणंति परिहरंति। पास-परिसरणेण, तित्थय-रायस्स जिणचंदस्स॥
23. पास-परिसरणेण, जो पवइ सुद्ध-भावेण सयं। तस्स भवइ न किंचि दुव्वं, सव्वदुक्ख-पहाणं॥
24. पास-परिसरणं, जो धारेइ सुद्ध-भावेण सयं। तस्स सग्ग-मग्गं, पावइ सव्वसिद्धि-मुक्कं॥
25. कमठ-विष-भयाणि, तुच्छंति विहुणंति परिहरंति। पास-परिसरणेण, तित्थय-रायस्स जिणचंदस्स॥
26. सव्वमंडल-मज्जाणं, हदयं सुद्ध-सोवणं हवंति। पारस्स परिसरणेण, तित्थय-रायस्स जिणचंदस्स॥
27. उवसग्गहरं पासं, पासं वंदामि कम्मघण-मुक्कं। विसहर-विसभीमंतं, कमठ-संपज्जवेणिविवत्तं॥
---
If you need a translation or explanation of any verse, please let me know!