What are the samyaktva ke 67 bol
“Samyaktva ke 67 bol” का मतलब है – सम्यग्दर्शन (सम्यक्त्व) के 67 गुण / बोल, जिनसे पता चलता है कि हमारे भीतर सच्ची श्रद्धा (समकित) है या नहीं। इन्हें मुख्यतः 12 समूहों में बाँटा गया है:
- श्रद्धान – 4
तत्वों (जीव, अजीव, पाप, पुण्य, बन्ध, मोक्ष आदि) में सच्ची श्रद्धा को जगाने‑बचाने वाले 4 उपाय।
- लिङ्ग – 3
सम्यग्दृष्टि के 3 बाहरी रूप/पहचान – जैसे आचरण, व्यवहार आदि से समझ में आने वाले लक्षण।
- विनय – 10
श्रद्धा से पैदा हुई नम्रता – अरिहन्त, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय, साधु, कुल, गण, चतुर्विध संघ, साधर्मी और क्रियावान के प्रति 10 प्रकार की विनय/भक्ति।
- शुद्धि – 3
सम्यक्त्व को स्वच्छ और निष्कपट रखने की 3 तरह की पवित्रता (विशेषतः दृष्टि, ज्ञान, चारित्र से जुड़ी शुद्धि)।
- लक्षण – 5
सम्यक्त्व आने पर जो 5 गुण अवश्य होते हैं – सम (उग्र कषाय न होना), संवेग (मोक्ष की तीव्र इच्छा), निर्वेद (संसार से वैराग्य), अनुकम्पा (दुःखी जीवों के प्रति दया), और आस्था (जिनवाणी पर दृढ़ श्रद्धा)।
- दूषण – 5
सम्यक्त्व को खराब करने वाले 5 दोष – जैसे शंका, काँक्षा, वितिगिच्छा, पर‑पाखण्ड की प्रशंसा और पर‑पाखण्डी संस्तव (घनिष्ठ संगति) आदि।
- भूषण – 5
सम्यक्त्व को और सुंदर/मजबूत बनाने वाले 5 आभूषण – जैसे जिनशासन में निपुण होना, जिनशासन की प्रभावना करना, चार तीर्थ की सेवा, ढीले पड़े धर्मात्माओं को स्थिर करना, गुणी पुरुषों का आदर‑सत्कार।
- प्रभावना (या प्रभावक) – 8
सम्यक्त्व की कीर्ति बढ़ाने वाले 8 प्रकार के कार्य – जिनसे जिनधर्म और सम्यग्दर्शन की महिमा संसार में फैलती है।
- आगार – 6
व्रत लेते समय जो 6 प्रकार की “छूटें” बतायी जाती हैं (राजाभियोग, गणाभियोग आदि) ताकि अत्यन्त विवश अवस्था में भी सम्यक्त्व न टूटे।
- यत्न / यतना – 6
सम्यक्त्व रूप धन को मिथ्यात्व रूप चोरों से बचाने के 6 प्रयास – जैसे आलाप, संलाप, दान, मान, वन्दना आदि का सही उपयोग सम्यग्दृष्टि के पक्ष में करना।
- भावना – 6
सम्यक्त्व में दृढ़ता लाने वाली 6 प्रकार की भावनाएँ – जैसे “समकित धर्म रूपी वृक्ष का मूल है, धर्म रूपी नगर का द्वार है, प्रासाद की नींव है” आदि भाव।
- स्थानक – 6
धर्म की उत्पत्ति और स्थिरता में सहायक 6 सिद्धान्त – जैसे जीव चेतन है, जीव शाश्वत है, कर्मों का कर्ता‑भोक्ता है, भव्य जीव मोक्ष जा सकता है, और सम्यग् ज्ञान‑दर्शन‑चारित्र‑तप मोक्ष के उपाय हैं।
इन्हीं 4+3+10+3+5+5+5+8+6+6+6+6 = 67 बोल/गुण को “सम्यक्त्व के 67 बोल” कहा जाता है।
- यह विषय विशेष रूप से श्वेताम्बर परम्परा में, उपाध्याय यशोविजयजी आदि आचार्यों की रचनाओं में बहुत विस्तार से आया है।
- दिगम्बर और श्वेताम्बर – दोनों में सम्यग्दर्शन का मूल अर्थ एक ही है (सत्य तत्त्वों में निष्कपट श्रद्धा), भले ही गिनती/श्रेणीकरण में थोड़ा अंतर मिल सकता है।