क्या इस पंचम काल में क्षायिक सम्यग्दर्शन मिल सकता है ?
संक्षेप उत्तर: हाँ, पंचम काल में सम्यग्दर्शन (सही दर्शन) तो अवश्य मिल सकता है, परन्तु क्षायिक सम्यग्दर्शन के विषय में परम्पराओं में मतभेद है, और व्यवहार में उसे अत्यन्त दुर्लभ‑से‑भी‑दुर्लभ माना गया है।
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1. पहले समझें – सम्यग्दर्शन के प्रकार
जैन दर्शन में मुख्य रूप से तीन प्रकार माने जाते हैं:
- क्षायिक सम्यग्दर्शन
- दर्शन‑मोहनीय कर्म का पूरा नाश (क्षय) हो जाता है। - अब सम्यक्त्व फिर कभी नष्ट नहीं होता। - यही सबसे उच्च कोटि का सम्यग्दर्शन है।
- क्षयोपशमिक सम्यग्दर्शन
- दर्शन‑मोहनीय कर्म का कुछ भाग नष्ट (क्षय) और कुछ भाग शांत (उपशम) होता है। - यह हमारे सामान्य “सम्यग्दृष्ट” जीवों के लिए माना जाता है। - सावधान न रहें तो सम्यक्त्व छिन भी सकता है (मिथ्यात्व में गिर सकते हैं)।
- उपशमिक सम्यग्दर्शन
- केवल थोड़ा समय के लिए कर्म दब जाते हैं, नष्ट नहीं होते; यह भी बहुत अल्पकालिक अवस्था है।
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2. पंचम काल में क्या संभव है?
सब संप्रदायों में एक मत लगभग यह है:
- मोक्ष (सिद्धपद) – अभी के पंचम काल में नहीं मिलता।
- चौथे काल के अंत तक मोक्ष होता था। - पाँचवें और छठे काल में मोक्ष नहीं होता; अगली उत्सर्पिणी में फिर से होगा।
- सम्यग्दर्शन मिलना – सम्भव है।
- श्रुत, आगम, आचार्य, साधु‑संघ आदि के माध्यम से - सही श्रद्धा, सही निश्चय, और चारित्र में प्रवृत्ति द्वारा - कोई भी जीव सम्यक्त्व (सम्यग्दर्शन) प्राप्त कर सकता है।
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3. विशेष प्रश्न – “क्षायिक सम्यग्दर्शन” पंचम काल में?
यहाँ पर मतभेद पाए जाते हैं, सरल भाषा में:
- बहुत से आचार्य (विशेषतः व्यवहार में) यह मानते हैं कि
- कुछ तत्त्व‑चर्चा में सिद्धान्त रूप से यह कहा जाता है कि
इसलिए व्यावहारिक रूप से
- आज जिनका सम्यक्त्व की बात की जाती है,
- उन्हें प्रायः क्षयोपशमिक सम्यग्दृष्ट ही माना जाता है,
- क्षायिक सम्यग्दर्शन को तो बहुत ऊँची, स्थायी और विरल अवस्था के रूप में शास्त्र में वर्णित किया गया है।
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4. सार
- पंचम काल में
हमारे लिए मुख्य बात यह है कि जितना हो सके सम्यग्दर्शन को शुद्ध, अचल और नित्य की दिशा में ले जाएँ – यही मोक्ष‑मार्ग की सबसे बड़ी तैयारी है, चाहे काल कैसा भी हो।