पांचवे गुणस्थान तक क्षयोपशमिक सम्यग्दर्शन से पहुंचा जा सकता है क्या ?
हाँ, पाँचवें गुणस्थान (देशविरत सम्यग्दृष्टि गुणस्थान) तक पहुँचना केवल क्षयोपशमिक सम्यग्दर्शन के आधार पर ही होता है – और यह जैन सिद्धांत दोनों परम्पराओं (श्वेतांबर–दिगंबर) में मान्य है।
संक्षेप में क्रम ऐसे समझिए:
- ४था गुणस्थान – अविरत सम्यग्दृष्टि
- यहाँ जीव को सम्यग्दर्शन क्षयोपशम से मिला है, पर अभी व्रत आदि नहीं लिए, अविरत है।
- ५वा गुणस्थान – देशविरत सम्यग्दृष्टि
- यह भी क्षयोपशमिक सम्यग्दर्शन वाला ही जीव है, - फर्क यह कि अब कुछ आंशिक व्रत लेकर देशविरत हो गया है (थोड़ी–बहुत विरति)। - सम्यग्दर्शन अभी केवल क्षयोपशम की ही स्थिति में रहता है, पूरा क्षय (क्षायिक सम्यग्दर्शन) आगे ऊँचे गुणस्थानों में होता है।
इसलिए आपके प्रश्न का सीधा उत्तर:
हाँ, पाँचवे गुणस्थान तक जीव क्षयोपशमिक सम्यग्दर्शन से ही पहुँचता है; क्षायिक (पूर्ण क्षय वाला) सम्यग्दर्शन आवश्यक नहीं होता।